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मोऽ से छल किये जा … सैंयां बे-ईमान-2

Mose Chhal Kye Ja…..O Saiya Beiman-2

मेरी पिछली कहानी” मोऽ से छल किये जा … सैंयां बे-ईमान-1

लेखक : प्रेम गुरु

आज मनीष ने जल्दी घर आने का वादा किया था। कल मेरा जन्म दिन है ना। आज हम दोनों मेरे जन्मदिवस की पूर्व संध्या को कुछ विशेष रूप से मनाना चाहते थे इसीलिए किसी को हमने इस बारे में नहीं बताया था। मैंने आज अपने सारे शरीर से अनचाहे बाल साफ़ किये थे। (तुम तो जानती हो मैं अपने गुप्तांगों के बाल शेव नहीं करती ना कोई बालसफा क्रीम या लोशन आदि लगाती हूँ। मैं तो बस वैक्सिंग करती हूँ तभी तो मेरी मुनिया अभी भी किसी 14-15 साल की कमसिन किशोरी की तरह ही लगती है एकदम गोरी चिट्टी। फिर मैं उबटन लगा कर नहाई थी। अपने आपको किसी नवविवाहिता की तरह सजाया था। लाल रंग की साड़ी पहनी थी। जूड़े और हाथों में मोगरे के गज़रे, हाथों में मेहंदी और कलाइयों में लाल चूड़ियाँ, माथे पर एक बिंदी जैसे पूर्णिमा का चन्द्र आकाश में अपनी मीठी चांदनी बिखेर रहा हो। शयन कक्ष पूरी तरह सजाया था जैसे कि आज हमारी सुहागरात एक बार फिर से मनने वाली है। इत्र की भीनी भीनी सुगंध, गुलाब और चमेली के फूलों की पत्तियों से सजा हुआ पलंग।

सावन का महीना चल रहा है मैं उन पलों को आज एक बार फिर से जी लेना चाहती थी जो आज से 4-5 साल पहले चाहे अनजाने में या किन्ही कमजोर क्षणों में जिए थे। एक बार इस सावन की बारिश में फिर से नहाने की इच्छा बलवती हो उठी थी जैसी। सच पूछो तो मैं उन पलों को स्मरण करके आज भी कई बार रोमांचित हो जाती हूँ पर बाद में उन सुनहरी यादों में खो कर मेरी अविरल अश्रुधारा बह उठती है। काश वो पल एक बार फिर से आज की रात मेरे जीवन में दोबारा आ जाएँ और मैं एक बार फिर से मीनल के स्थान पर मैना बन जाऊं। मैं आज चाहती थी कि मनीष मुझे बाहों में भर कर आज सारी रात नहीं तो कम से कम 12:00 बजे तक प्रेम करता रहे और जब घड़ी की सुईयां जैसे ही 12:00 से आगे सरके वो मेरी मुनिया को चूम कर मुझे जन्मदिन की बधाई दे और फिर मैं भी अपनी सारी लाज शर्म छोड़ कर उनके “उसको” चूम कर बधाई दूं। और फिर सारी रात हम आपस में गुंथे किलोल करते रहें। रात्रि के अंतिम पहर में उनींदी आँखें लिए मैं उनके सीने से लगी रहूँ और वो मेरे सारे अंगों को धीमे धीमे सहलाता और चूमता रहे जब तक हम दोनों ही नींद के बाहुपाश में ना चले जाएँ।

सातों श्रृंगार के साथ सजधज कर मैं मनीष की प्रतीक्षा कर रही थी। लगता था आज बारिश जरुर होगी और इस सावन की यह रिमझिम फुहार मेरे पूरे तन मन को आज एक बार जैसे फिर से शीतल कर जायेगी। दूरदर्शन पर धीमे स्वरों में किसी पुरानी फिल्म का गाना आ रहा था :

झिलमिल सितारों का आँगन होगा

रिमझिम बरसता सावन होगा।

मनीष कोई 8 बजे आया। उनके साथ श्याम भी थे। श्याम को साथ देख कर मुझे बड़ा अटपटा सा लगा। अन्दर आते ही श्याम ने मुझे बधाई दी “भाभी आपको जन्मदिन की पूर्व संध्या पर बहुत बहुत बधाई हो ?”

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ? श्याम को मेरे जन्मदिन का कैसे पता चला। ओह… यह सब मनीष की कारगुजारी है। मैंने उनका औपचारिकतावश धन्यवाद किया और बधाई स्वीकार कर ली। उन्होंने मेरे हाथों को चूम लिया जैसा कि उस दिन किया था पर आज पता नहीं क्यों उनका मेरे हाथों को चूमना तनिक भी बुरा नहीं लगा ?

आपको एक बधाई और देनी है !”

“क… क्या मतलब मेरा मतलब है कैसी बधाई ?”

“मनीष आज रात ही एक हफ्ते के लिए ट्रेनिंग पर जा रहा है मुंबई?”

“ट्रेनिंग … ? कैसी ट्रेनिंग ?”

“अरे मनीष ने नहीं बताया ?”

“न… नहीं तो ?”

“ओह मनीष भी अजीब नालायक है यार। ओह सॉरी। वास्तव में उसके प्रमोशन के लिए ये ट्रेनिंग बहुत जरुरी है।”

“ओह… नो ?”

“अरे तुम्हें तो खुश होना चाहिए ? तुम्हें तो मुझे धन्यवाद देना चाहिए कि मैंने ही उसका नाम प्रपोज़ किया है? क्या हमें मिठाई नहीं खिलाओगी मैनाजी ?”

उनके मुंह पर मैना संबोधन सुनकर मुझे बड़ा अटपटा सा लगा। मेरा यह नाम तो केवल प्रेम भैया या कभी कभी मनीष ही लेता है फिर इनको मेरा यह नाम …

मैंने आश्चर्य से श्याम की ओर देखा तो वो बोला,”भई मनीष मुझ से कुछ नहीं छिपाता। हम दोनों का बॉस और सहायक का रिश्ता नहीं है वो मेरा मित्र है यार” श्याम एक ही सांस में कह कर मुस्कुराने लगा। और मेरी ओर उसने हाथ बढ़ाया ही था कि अन्दर से मनीष की आवाज ने हम दोनों को चोंका दिया,”मीनू एक बार अन्दर आना प्लीज मेरी शर्ट नहीं मिल रही है।”

मैं दौड़ कर अन्दर गई। अन्दर जाते ही मैंने कहा “तुमने मुझे बताया ही नहीं कि तुम्हें आज ही ट्रेनिंग पर जाना है ?”

“ओह मेरी मैना तुम्हें तो खुश होना चाहिए। देखो यहाँ आना हमारे लिए कितना लकी है कि आते ही ट्रेनिंग पर जाना पड़ गया और फिर वापस आते ही प्रमोशन पक्का !” उसने मुझे बाहों में भर कर चूम लिया।

“पर क्या आज ही जाना जरुरी है ? तुम कल भी तो जा सकते हो ? देखो कल मेरा जन्मदिन है और …?” मैंने अपने आप को छुड़ाते हुए कहा।

“ओह मीनू डीयर… ऐसा अवसर बार बार नहीं आता तुम्हारा जन्मदिन फिर कभी मना लेंगे !” उसने मेरे गालों पर हलकी सी चपत लगाते हुए कहा।

“ओह … मनीष प्यार-व्यार बाद में कर लेना यार 10:00 बजे की फ्लाइट है अब जल्दी करो।”

पता नहीं यह श्याम कब से दरवाजे के पास खड़ा था। मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं रोऊँ या हंसूं ?

अपना सूटकेस पैक करके बिना कुछ खाए पीये मनीष और श्याम दोनों जाने लगे। मैं दौड़ती हुई उनकी कार तक आई। कार के अन्दर सोनिया (श्याम की सेक्रेटरी) बैठी हुई अपने नाखूनों पर नेल पोलिश लगा कर सुखा रही थी। मुझे एक झटका सा लगा। इसका क्या काम है यहाँ ? इस से पहले कि मैं कुछ बोलूँ श्याम बोला,”भाभी आप भी एअरपोर्ट तक चलो ना ? क्या मनीष को सी ऑफ करने नहीं चलोगी ?”

यह बात तो मनीष को कहनी चाहिए थी पर वो तो इस यात्रा और ट्रेनिंग के चक्कर में इतना खोया था कि उसे किसी बात का ध्यान ही नहीं था। लेकिन श्याम की बात सुनकर वो भी बोला, “हाँ.. हाँ मीनू तुम भी चलो आते समय श्याम भाई तुम्हें घर छोड़ देंगे।”

मैं मनीष के साथ अगली सीट पर बैठ गई। रास्ते में मैंने बैक मिरर में देखा था किस तरह वो चुड़ैल सोनिया श्याम की पैंट पर हाथ फिरा रही थी। निर्लज्ज कहीं की।

वापस लौटते समय श्याम ने मुझे बताया,”देखो मनीष को तुम्हारी ज्यादा याद ना आये इसलिए मैंने सोनिया को भी उसके साथ ट्रेनिंग पर भेज दिया है। चलो मज़े करने दो दोनों को !” और वो जोर जोर से हंसने लगा। मेरे तो जैसे पैरों के तले से जमीन ही खिसक गई। यह तो सरे आम नंगाई है। रास्ते में मैं कुछ नहीं बोली। मैं तो चाहती थी कि जल्दी से घर आ जाए और इनसे पीछा छूटे।

कोई पौने 11:00 बजे हम घर पहुंचे। श्याम ने कहा,”क्या हमें एक कप चाय या कॉफ़ी नहीं पिलाओगी मीनूजी ?”

“ओह … हाँ ! आइये !” ना चाहते हुए भी मुझे उसे अन्दर बुलाना पड़ा। मुझे क्रोध भी आ रहा था ! मान ना मान मैं तेरा महमान। अन्दर आकर वो सोफे पर पसर गया। मैंने रसोई में जाने का उपक्रम किया तो वो बोला “अरे भाभी इतनी जल्दी भी क्या है प्लीज बैठो ना ? आराम से बना लेना चाय ? आओ पहले कुछ बातें करते हैं?”

“ओह ?” मैंने आश्चर्य से उनकी ओर देखा “कैसी बातें ?”

“अरे यार बैठो तो सही ?”

उसने मेरी बांह पकड़ कर बैठाने की कोशिश की तो मैं उनसे थोड़ा सा हटकर सोफे पर बैठ गई।

“मीनू उसने मुझे पहले नहीं बताया कि कल तुम्हारा जन्मदिन है नहीं तो उसकी ट्रेनिंग आगे पीछे कर देता यार !”

“कोई बात नहीं … पर यह कैसी ट्रेनिंग है ?”

श्याम हंसने लगा “अरे मनीष ने नहीं बताया ?”

मेरे लिए बड़ी उलझन का समय था। अब मैं ना तो हाँ कह सकती थी और ना ही ना। वो मेरी दुविधा अच्छी तरह जानता था। इसीलिए तो मुस्कुरा रहा था।

“अच्छा एक बात बताओ मीनू तुम दोनों में सब ठीक तो चल रहा है ना ?”

“क… क्या मतलब ?”

“मीनू तुम इतनी उदास क्यों रहती हो ? रात को सब ठीकठाक रहता है ना ?”

मुझे आश्चर्य भी हो रहा था और क्रोध भी आ रहा था किसी पराई स्त्री के साथ इस तरह की अन्तरंग बातें किसी को शोभा देती हैं भला ? पर पति का बॉस था उसे कैसे नाराज़ किया जा सकता था। मैं असमंजस में उसकी ओर देखती ही रह गई। मेरी तो जैसे रुलाई ही फूटने वाली थी। मेरी आँखों में उमड़ते आंसू उसकी नज़रों से भला कैसे छिपते। एक नंबर का लुच्चा है ये तो। देखो कैसे मेरा नाम ले रहा है और ललचाई आँखों से निहार रहा है।

“नहीं ऐसी कोई बात नहीं है … म… मेरा मतलब है सब ठीक है ?” किसी तरह मेरे मुँह से निकला।

“ओह मैं समझा … कल तो तुम्हारा जन्मदिन है ना ? और आज ही मनीष को मुंबई जाना पड़ गया। ओह … आइ ऍम सॉरी। पर भई उसके प्रमोशन के लिए जाना जरुरी था। पर तुम चिंता मत करो तुम्हारा जन्म दिन हम दोनों मिलकर मना लेंगे।”

मैं क्या बोलती। चुपचाप बैठी उसकी घूरती आँखें देखती रही।

कुछ पलों के बाद वो बोला,”देखो मीनू ! मनीष तुम्हारी क़द्र नहीं करता मैं जानता हूँ। तुम बहुत मासूम हो। यह ट्रेनिंग वगेरह तो एक बहाना है यार उसे दरअसल घूमने फिरने और मौज मस्ती करने भेजा है ? समझा करो यार ! घर की दाल खा खा कर आदमी बोर हो जाता है कभी कभी स्वाद बदलने के लिए बाहर का खाना खा लिया जाए तो क्या बुराई है ? तुम क्या कहती हो ?”

मैं उसके कहने का मतलब और नीयत अच्छी तरह जानती थी।

“नहीं यह सब अनैतिक और अमर्यादित है। मैं एक विवाहिता हूँ और उसी दकियानूसी समाज में रहती हूँ जिसकी परंपरा का निर्वाह तो करना ही पड़ता है। मनीष जो चाहे करे मेरे लिए यह कदापि संभव नहीं है। प्लीज आप चले जाएँ।” मैंने दृढ़ता पूर्वक कहा पर कहते कहते मेरी आँखें डबडबा उठी।

मैं जानती थी समाज की परंपरा भूल कर जब एक विवाहिता किसी पर पुरुष के साथ प्रेम की फुहार में जब भीगने लगती है तब कई समस्याएं और विरोध प्रश्न आ खड़े होते हैं।

मैं अपने आप पर नियंत्रण रखने का पूरा प्रयत्न कर रही थी पर मनीष की उपेक्षा और बेवफाई सुनकर आखिर मेरी आँखों से आंसू टपक ही पड़े। मुझे लगा अब मैं अपनी अतृप्त कामेक्षा को और सहन नहीं कर पाउंगी। मेरे मन की उथल पुथल वो अच्छी तरह जानता था। बाहर कहीं आल इंडिया रेडियो पर तामिले इरशाद में किसी पुरानी फिल्म का गाना बज रहा था :

मोऽ से छल कीये जाए… हाय रे हाय…

देखो …… सैंयाँ….. बे-ईमान ……

उसने मेरे एक हाथ पकड़ लिया और मेरी ठोडी पकड़ कर ऊपर उठाते हुए बोला,”देखो मीनू दरअसल तुम बहुत मासूम और परम्परागत लड़की हो। तुम जिस कौमार्य, एक पतिव्रता, नैतिकता, सतीत्व, अस्मिता और मर्यादा की दुहाई दे रही हो वो सब पुरानी और दकियानूसी सोच है। मैं तो कहता हूँ कि निरी बकवास है। सोचो यदि किसी पुरुष को कोई युवा और सुन्दर स्त्री भोगने के लिए मिल जाए तो क्या वो उसे छोड़ देगा ? पुरुषों के कौमार्य और उनकी नैतिकता की तो कोई बात नहीं करता फिर भला स्त्री जाति के लिए ही यह सब वर्जनाएं, छद्म नैतिकता और मर्यादाएं क्यों हैं ? वास्तव में यह सब दोगलापन, ढकोसला और पाखण्ड ही है। पता नहीं किस काल खंड में और किस प्रयोजन से यह सब बनाया गया था। आज इन सब बातों का क्या अर्थ और प्रसांगिकता रह गई है सोचने वाली बात है ? जब सब कुछ बदल रहा है तो फिर हम इन सब लकीरों को कब तक पीटते रहेंगे।”

उसने कहना चालू रखा “शायद तुम मुझे लम्पट, कामांध और यौन विकृत व्यक्ति समझ रही होगी जो किसी भी तरह तुम्हारे जैसी अकेली और बेबस स्त्री की विवशता का अनुचित लाभ उठा कर उसका यौन शोषण कर लेने पर आमादा है ? पर ऐसा नहीं है। देखो मीनू मेरे जैसे उच्च पदासीन और साधन संपन्न व्यक्ति के लिए सुन्दर लड़कियों की क्या कमी है ? तुम इस कोर्पोरेट कल्चर (संस्कृति) को नहीं जानती। आजकल तो 5-6 मित्रों का एक समूह बन जाता है और रात को सभी एक जगह इकट्ठा होकर अपने अपने साथी बदल लेते हैं। मेरे भी ऑफिस की लगभग सारी लड़कियां और साथ काम करने वालों की पत्नियां मेरे एक इशारे पर अपना सब कुछ लुटाने को तैयार बैठी हैं। मेरे लिए किसी भी सुन्दर लड़की को भोग लेना कौन सी बड़ी बात है?”

“दरअसल मुझे मनोरमा के साथ मजबूरन शादी करनी पड़ी थी और मैंने अपनी प्रेमिका को खो दिया था। जिन्दगी में हरेक को सब कुछ नसीब नहीं होता। मैं आज भी उसी प्रेम को पाने के लिए तड़फ रहा हूँ। जब से तुम्हें देखा है मुझे अपना वो 16 वर्ष पुराना प्रेम याद आ जाता है क्योंकि तुम्हारी शक्ल हूँ बहू उस से मिलती है।”

मैं तो जैसे मुंह बाए उन्हें देखती ही रह गई। उन्होंने अपनी बात चालू रखी

“देखो मीनू मैं तुम्हें अपने शब्द जाल में फंसा कर भ्रमित नहीं कर रहा हूँ। दर असल प्रेम और वासना में बहुत झीना पर्दा होता है। एक बात तो तुम भी समझती हो कि हर प्रेम या प्यार का अंत तो बस शारीरिक मिलन ही होता है। तुम जिसे वासना कह रही हो यह तो प्रेम की अंतिम अभिव्यक्ति है जहां शब्द मौन हो जाते हैं और प्रेम की परिभाषा समाप्त हो जाती है। दो प्रेम करने वाले एक दूसरे में समां जाते हैं तब दो शरीर एक हो जाते हैं और उनका अपना कोई पृथक अस्तित्व नहीं रह जाता। एक दूसरे को अपना सब कुछ सौंप कर एकाकार हो जाते हैं। इस नैसर्गिक क्रिया में भला गन्दा और पाप क्या है ? कुछ भ्रमित लोग इसे अनैतिक और अश्लील कहते हैं पर यह तो उन लोगों की गन्दी सोच है।”

“ओह श्याम बाबू मुझे कमजोर मत बनाओ प्लीज … मैं यह सब कदापि नहीं सोच सकती आप मुझे अकेला छोड़ दें और चले जाएँ यहाँ से।”

“मीनू मैं तुम्हें विवश नहीं करता पर एक बार मेरे प्रेम को समझो। ये मेरी और तुम्हारी दोनों की शारीरिक आवश्कता है। मैं जानता हूँ तुम भी मेरी तरह यौन कुंठित और अतृप्त हो। क्यों अपने इस रूप और यौवन को बर्बाद कर रही हो। क्या तुम्हारा मन नहीं करता कि कोई तुम्हें प्रेम करे और तुम्हारी चाहना को समझे ? मुझे एक बात समझ नहीं आती जब हम अच्छे से अच्छा भोजन कर सकते हैं, मन पसंद कपड़े, वाहन, शिक्षा, मनोरंजन का चुनाव कर सकते हैं तो फिर सेक्स के लिए ही ऐसा प्रतिबन्ध क्यों ? हम इसके लिए भी अपनी पसंद का साथी क्यों नहीं चुन सकते ? दरअसल इस परमानंद की प्राकृतिक चीज को कुछ तथाकथित धर्म और समाज के ठेकेदारों ने विकृत बना दिया है वरना इस नैसर्गिक सुख देने वाली क्रिया में कहाँ कुछ गन्दा या अश्लील है जिसके लिए नैतिकता की दुहाई दी जाती है ?”

“वो… वो … ?”

बाहर जोर से बिजली कड़की। मुझे लगा कि जैसे मेरे अन्दर भी एक बिजली कड़क रही है। श्याम की कुछ बातें तो सच ही हैं यह सब वर्जनाएं स्त्री जाति के लिए ही क्यों हैं ? जब मनीष विवाहित होकर खुलेआम यह सब किसी पराई स्त्री के साथ कर सकता है तो … तो मैं क्यों नहीं ??

“क्या सोच रही हो मीनू ? देखो अपने भाग्य को कोसने या दोष देने का कोई अर्थ नहीं है। मैं जानता हूँ मनीष को समझ ही नहीं है स्त्री जाति के मन की। ऐसे लोगों को प्रेम का ककहरा भी नहीं आता इन्हें तो प्रेम की पाठशाला में भेजना जरुरी होता है ? रही तुम्हारी बात तुम्हें कहाँ पता है कि वास्तव में प्रेम क्या होता है ?”

मैंने अपनी आँखें पहली बार उनकी और उठाई। यह तन और मन की लड़ाई थी। मुझे लगने लगा था कि इस तन की ज्वाला के आगे मेरी सोच हार जायेगी। मेरी अवस्था वो भली भाँति जानता था। उसने मेरे कपोलों पर आये आंसू पोंछते हुए कहना चालू रखा,”मीनू जब से मैंने तुम्हें देखा है और मनीष ने अपने और तुम्हारे बारे में बताया है पता नहीं मेरे मन में एक विचित्र सी हलचल होती रहती है। मैं आज स्वीकार करता हूँ कि मेरे सम्बन्ध भी अपनी पत्नी के साथ इतने मधुर नहीं हैं। मैं शारीरिक संबंधों की बात कदापि नहीं कर रहा। मैं जो प्रेम चाहता हूँ वो मुझे नहीं मिलता। मीनू हम दोनों एक ही नाव पर सवार हैं। हम दोनों मिलकर प्रेम के इस दरिया को पार कर सकते हैं। अब यह सब तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है कि तुम यूँ ही कुढ़ना चाहती हो या इस अनमोल जीवन का आनंद उठाना चाहती हो ? मीनू इसमें कुछ भी अनैतिक या बुरा नहीं है। यह तो शरीर की एक बुनियादी जरुरत है अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें प्रेम आनंद की उन ऊंचाइयों पर ले जा सकता हूँ जिस से तुम अब तक अनजान हो। मैं तुम्हें उस चरमोत्कर्ष और परमानंद का अनुभव करा सकता हूँ जिससे आज तक तुम वंचित रही हो !”

मैं तो विचित्र दुविधा में उलझ कर रह गई थी। एक ओर मेरे संस्कार और दूसरी ओर मेरे शरीर और मन की आवश्यकताएं ? हे भगवान्… अब मैं किधर जाऊं? क्या करूँ ? सावन की जिस रात में मैंने किन्हीं कमजोर क्षणों में अपना कौमार्य खो दिया था उन पलों को याद कर के आज भी मैं कितना रोमांच से भर जाती हूँ। शायद वैसे पल तो इन दो सालों में मेरे जीवन में कभी लौट कर आये ही नहीं। श्याम जिस प्रकार की बातें कर रहा है मैं इतना तो अनुमान लगा ही सकती हूँ कि वो प्रेम कला में निपुण हैं। किसी स्त्री को कैसे काम प्रेरित किया जाता है उन्हें अच्छी तरह ज्ञात है। जब मनीष को मेरी कोई परवाह नहीं है तो फिर मैं उसके पीछे क्यों अपने यौवन की प्यास में जलती और कुढ़ती रहूँ ?

प्रकृति ने स्त्री को रूप यौवन के रूप में बहुत बड़ा वरदान दिया है जिसके बल पर वो बहुत इतराती है लेकिन उसके साथ एक अन्याय भी किया है कि उसे अपने यौवन की रक्षा के लिए शक्ति प्रदान नहीं की। कमजोर क्षणों में और पुरुष शक्ति के आगे उसके लिए अपना यौवन बचाना कठिन होता है। पर मेरे लिए ना तो कोई विवशता थी ना मैं इतनी कमजोर थी पर मेरा मन विद्रोह पर उतर आया था। जब नारी विद्रोह पर उतर आती है तो फिर उन मर्यादाओं और वर्जनाओं का कोई अर्थ नहीं रह पाता जिसे वो सदियों से ढोती आ रही है।

और फिर मैंने सब कुछ सोच लिया ……

आपके मेल की प्रतीक्षा में ……

प्रेम गुरु और मीनल (मैना रानी)

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