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मधुर प्रेम मिलन-3

Madhur Prem Milan- Part 3

मैं घूम कर फिर से उनके सीने से लग गई और उनके गले में बाहें डाल कर उनके होंठों पर एक चुम्बन ले लिया। जैसे किसी शरारती बच्चे को किसी भूल के लिए क्षमा कर दिया जाये तो उसका हौसला और बढ़ जाता है प्रेम ने भी मेरे होंठों, गालों और उरोजों की घाटी में चुम्बनों की झड़ी ही लगा दी। इसी उठापटक में मेरा जूड़ा खुल गया था और मेरे सर के बाल मेरे नितम्बों तक आ गए।

हम दोनों ही अभी तक फर्श पर ही खड़े थे। मैंने उन्हें पलंग पर चलने का इशारा किया। उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में उठा लिया और हम एक दूसरे से चिपके पलंग पर आ गए। अब प्रेम ने अपना कुरता और पायजामा उतार फेंका। अब उनके शरीर पर भी केवल एक चड्डी ही रह गई थी। हलकी रोशनी में उसके अंदर बना उभार मुझे साफ़ दिखाई दे रहा था।

मेरा अप्रतिम सौन्दर्य भी तो मात्र एक हल्की सी चोली और पेंटी में ढका पलंग पर अपने साजन की प्रतीक्षा में जैसे बिखरा पड़ा था। प्रेम तो मेरे इस रूप को अपलक निहारता ही रह गया। उसकी आँखें तो बस मेरी तेज़ होती साँसों के साथ उठते गिरते वक्षस्थल और जाँघों के बीच गज़रे की लटकन के ऊपर अटकी ही रह गई थी। उन्हें अपनी और निहारता देख मैंने लाज के मारे मैं अपने हाथ अपनी आँखों पर रख लिये।

‘मेरी प्रियतमा! मेरी स्वर्ण नैना! अपनी इन नशीली आँखों को खोलो ना?’ उन्होंने मेरी ठोड़ी को छूते हुए कहा।

मैं क्या बोलती। मैंने अपने हाथ अपने चहरे से हटा लिए और अपनी बाहें उनकी ओर फैला दी। उन्होंने मेरे ऊपर आते हुए झट मुझे अपनी बाहों में भर लिया। इस बार तो वो इतने उतावले हो रहे थे कि जरा सी देर होते ही जैसे कोई गाड़ी ही छूट जायेगी। मैंने भी कस कर अपने बाहें उनकी पीठ पर लपेट ली।

अब वो कभी मेरे गालों को कभी अधरों को कभी उरोजों की घाटी को और कभी मेरी नर्म बाहों को चूमते और सूंघते। पहले तो मुझे लगा वो बाजुओं पर बंधे गज़रे को सूंघ रहे होंगे पर बाद में मुझे समझ आया कि वो तो मेरी बगल से आती मादक गंध को सूंघ रहे थे। मैंने कहीं पढ़ा था युवा स्त्री की देह से, विशेष रूप से उसकी बगलों से, एक मादक गंध निकलती है जो पुरुष को सम्भोग के लिए प्रेरित और आकर्षित करती है।

अचानक उनके हाथ मेरी पीठ पर आ गए और चोली की डोरी टटोलने लगे। हे भगवान! ये तो मुझे पूरी ही निर्वस्त्र कर देंगे। मीनल सच कहती थी कि देख लेना प्रेम तो तुम्हें पूरी तरह इको फ्रेंडली करके ही दम लेंगे।

उनके हाथ में चोली की डोर आ ही गई। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा। उनका दूसरा हाथ मेरे कूल्हों पर और कभी कभी मेरी जांघों के बीच भी फिर रहा था। मेरी तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। मैं इस बार कोई विरोध नहीं करना चाहती थी। जैसे ही उन्होंने डोरी को खींचा, मेरे दोनों अमृत कलश स्वतंत्र हो गए। उन्होंने चोली को निकाल फेंका। मैंने मारे शर्म के उन्हें कस कर अपनी बाहों में भींच लिया।

उनका मुँह अब मेरे अमृत कलशों के ठीक बीच लगा था। उन्होंने मेरे नर्म उरोजों पर हलके से अपने होंठों और गालों को फिराया तो मेरे स्तनाग्र (चूचक) तो अहंकारी होकर इतने अकड़ गए जैसे कोई भाले की नोक हों। चने के दाने जैसे चूचक तो गुलाबी से रक्तिम हो गए। मुझे लगा मेरी लाडो में जैसे खलबली सी मचने लगी है। ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ था।

एक बात आपको बताती हूँ। मेरे बाएं स्तन के एरोला (चूचकों के चारो ओर बना लाल घेरा) के थोड़ा सा नीचे एक छोटा सा तिल है। मीनल ने शरारत करते हुए उस जगह पर मेहँदी से फूल-बूटे बना दिए थे। प्रेम ने ठीक उसी जगह को चूम लिया। ओह… मीनल ने तो मेरी दाईं जांघ पर अंदर की तरफ जो तिल है उस पर भी फूल सा बना दिया था।
मीनल बताती है कि ‘जिस स्त्री की दाईं जांघ पर तिल होता है वो बड़ी कामुक होती है। उसकी शमा नाम की एक सहेली है उसकी दाईं जांघ पर भी तुम्हारी तरह तिल है और उसका पति उसे आगे और पीछे दोनों तरफ से खूब मज़ा ले ले कर बजाता है’

हे भगवान्! अगर प्रेम ने मेरे इस तिल को देख लिया तो क्या सोचेगा और करेगा? मैं तो मर ही जाऊँगी।

मैं अपने विचारों में खोई थी कि अचानक प्रेम ने मेरे एक स्तनाग्र (चूचक) को मुँह में भर लिया और उसे पहले तो चूसा और फिर होले से उसे दांतों के बीच लेकर दबा दिया। मेरी तो एक मीठी किलकारी ही निकल गई। उनका एक हाथ मेरी जाँघों के बीच होता हुआ मेरी लाडो को स्पर्श करने लगा था।

ओह… मीनल ने भी जानबूझ कर मुझे इस प्रकार की पेंटी पहने को कहा था। वो कहती थी कि मैं इस पेंटी में बिल्कुल आइटम लगूंगी। यह पेंटी तो इतनी पतली और पारदर्शी है कि इतनी हलकी रोशनी में भी मेरी लाडो के मोटे मोटे पपोटे स्पष्ट दिखाई दे रहे होंगे। आगे से केवल 2 इंच चौड़ी पट्टी सी है जो छुपाती कम और दिखाती ज्यादा है। पेंटी इतनी कसी रहती है कि उसकी आगे वाली यह पट्टी दोनों कलिकाओं में बीच धंस सी जाती है।

प्रेम लगातार मुझे चूमे जा रहा था। कभी वो एक उरोज को मुँह में भर लेता और दूसरे को होले से मसलता और फिर दूसरे को मुँह में लेकर चूसने लग जाता। अब वो होले होले नीचे सरकने लगा। उसने पहले मेरी नाभि को चूमा और फिर पेडू को। मेरी तो हालत ही खराब होने लगी थी।

मेरे ना चाहते हुए भी मेरी जांघें अपने आप खुलने लगी। उसने पेंटी के ऊपर से ही मेरी लाडो को चूम लिया। उनकी गर्म साँसों का आभास पाते ही मुझे लगा मेरी सारी देह तरंगित सी होकर झनझना उठी है और कुछ गर्म सा द्रव्य मेरी लाडो से बह निकला है।

ईईईई ईईईईईईईई…

प्रेम ने मेरी दाईं जांघ पर ठीक उसी जगह जहाँ मेहंदी से फूल बना था, चूम लिया (तिल वाली जगह)। मेरी तो किलकारी ही निकल गई। मैंने उनका सर अपने हाथों में पकड़ लिया। प्रेम कभी मेरी जाँघों को चूमते कभी लाडो की उभरी हुई फांकों को ऊपर से चूम लेते। मीनल सच कहती थी इस दुनिया में प्रेम मिलन से आनंददायी कोई दूसरी क्रिया तो हो ही नहीं सकती।

पेंटी इतनी कसी थी कि हाथ तो अंदर जा नहीं सकता था, प्रेम अपनी एक अंगुली पेंटी की किनारी के अंदर सरका कर होले से मेरी कलिकाओं को टटोलने लगे।
मेरी तो मारे रोमांच और लाज के सिसकी ही निकल गई।

उनकी अँगुलियों का प्रथम स्पर्श पाते ही मेरी गीली, गुलाबी और नर्म नाज़ुक कलिकाएँ जैसे थिरक सी उठी और रोम रोम तरंगित सा होने लगा। मैंने दो दिन पहले ही अपनी केशर क्यारी को साफ़ किया था।

आपको बता दूँ, मैं अपनी बगलों और लाडो पर उगे बालों कैंची से ही ट्रिम किया करती थी इसलिए वो अभी तक बहुत मुलायम ही हैं। और लाडो तो बिना बालों के अब चकाचक बनी थी।

जैसे ही उनकी अंगुली मेरे चीरे के बीच आई मुझे लगा मेरी आँखों में सतरंगी तारे से झिलमिलाने लगे हैं। मुझे लगा मेरा रतिरस निकल जाएगा। मेरा मन अब आनंद के सागर के किनारे पर ना रह कर उसमें डूब जाने को करने लगा था। मेरी लम्बी श्वास छूट रही थी। मेरी सारी देह में जैसे तूफ़ान सा आ रहा था और साँसे अनियंत्रित होने लगी थी। मेरा मन करने लगा था की अब प्रेम को जो करना है जल्दी से कर डालें, अब सहन नहीं हो रहा है। मैं तो इस समय सारी लाज छोड़ कर पूर्ण समर्पित बन चली थी।

अब उनके हाथ मुझे अपनी पेंटी की डोरी पर सरकते अनुभव हुए। मैं किसी भी प्रकार के नए रोमांच को झेलने के लिए अपने आप को मानसिक रूप से तैयार कर चुकी थी।

उन्होंने डोरी को हल्का सा झटका लगाया और फिर केले के छिलके की तरह उस दो इंच चौड़ी पट्टी वाली पेंटी को खींच कर निकाल दिया। बड़ी मुश्किल से अब तक सहेज और छुपा कर रखा मेरा अनमोल खजाना उजागर हो गया। अनछुई कच्ची कलि अपनी मुलायम पंखुड़ियों को समेटे ठीक उनकी आँखों के सामने थी। प्रेम थोड़ा सा उठ खड़ा हुआ और मेरी लाडो को देखने लगा। मैंने मारे शर्म के अपने दोनों हाथ अपनी आँखों पर रख लिए।

‘मधुर तुम बहुत खूबसूरत हो!’

एक बार तो मेरे मन में आया कि कह दूँ ‘हटो परे झूठे कहीं के?’ पर मैं ऐसा कैसे बोल पाती। मेरा सारा शरीर एक अनोखे स्पंदन से झनझना उठा, पता नहीं प्रेम की क्या हालत हुई होगी।

होले से उनके हाथ मेरी लाडो की ओर बढ़े। उनका पहला स्पर्श पाते ही मेरी दबी दबी किलकारी ही निकल गई और जांघें स्वतः आपस में भींच गई। पहले तो उन्होंने मेरी भगोष्ठों (कलिकाओं) को होले से छुआ फिर अपनी अंगुली मेरे रक्तिम चीरे पर 2-3 बार होले होले फिराई। उसके बाद उन्होंने अपने अंगूठे और तर्जनी अंगुली से मेरी लाडो की गुलाबी पंखुड़ियों को चौड़ा कर दिया। जैसे किसी तितली ने अपने पंख फैला दिए हों या गुडहल की कमसिन कलि चटक कर खिल उठी हो।

उन्होंने अपनी एक अंगुली को होले से रतिरस में डूबी लाडो के अंदरूनी भाग में ऊपर से नीचे फिराया और फिर नीचे से ऊपर करते हुए मेरे योनि-मुकुट को दबा दिया।

मेरे लिए यह क्षण कितने संवेदनशील थे मैं ही जानती हूँ। मेरे सारे शरीर में झनझनाहट सी महसूस होने लगी थी और लगा मेरा सारा शरीर जैसे तरावट से भर गया है।

मुझे तो लगने लगा था कि आज मेरा रतिरस सारे बाँध ही तोड़ देगा। कुंवारी देह की प्रथम रस धार… चिपचिपा सा मधु रस उनकी अंगुली को भिगो सा गया।

अरे यह क्या… उन्होंने तो उस अंगुली को अपने मुँह में ही ले लिया। उनके चेहरे पर आई मुस्कान से इसकी मिठास और स्वाद का अनुमान लगाया जा सकता है।

‘मधुर तुम्हारी मुनिया का मधुर बहुत मीठा है!’

‘छी… हटो परे… झूठे कहीं के…?’ पता नहीं मेरे मुँह से कैसे निकल गया।

हे भगवान्! कहीं प्रेम अब मेरी लाडो को तो मुँह में नहीं भर लेगा? मैं तो सोच कर ही सिहर उठी। पर मैंने पूरा मन बना लिया था कि मैं आज उन्हें किसी चीज के लिए मना नहीं करूंगी।

अब प्रेम ने भी अपना अन्डरवीयर उतार फेंका। मैंने कनखियों से देखा था उनका गोरे रंग का ‘वो’ कोई 7 इंच लम्बा और डेढ़ दो इंच मोटा तो जरुर होगा। वो तो झटके से मारता ऐसा लग रहा था जैसे मुझे सलामी दे रहा हो। मुझे तो उसे देखते ही झुरझुरी सी आ गई। हे भगवान्! यह मेरी छोटी सी लाडो के अंदर कैसे जाएगा।

उनका ‘वो’ अब मेरी जाँघों के बीच चुभता सा महसूस हो रहा था। उनकी साँसें बहुत तेज़ हो रही थी। मैं जानती थी अब वो पल आने वाले हैं जिसे मधुर मिलन कहते हैं। सदियों से चले आ रहे इस नैसर्गिक आनंददायी क्रिया में नया तो कुछ नहीं था पर हम दोनों के लिए तो यह दाम्पत्य जीवन का प्रारम्भ था।

‘मधुर…?’
‘हुं…?’
‘वो… वो… मेरी प्रियतमा… तुम बहुत खूबसूरत हो!’
‘हुं…!’
‘तुम भी कुछ बोलो ना?’

मेरी हंसी निकलते निकलते बची। मैं जानती थी वो क्या चाहते हैं पर ऐसी स्थिति में शब्द मौन हो जाते हैं और कई बार व्यक्ति चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाता। जुबान साथ नहीं देती पर आँखें, धड़कता दिल और कांपते होंठ सब कुछ तो बयान कर देते हैं।

मेरा मन तो कह रहा था कि ‘मेरे प्रेम… मेरे सनम… जो करना है कर लो… ये प्रेम दीवानी तुम्हें किसी चीज के लिए मना नहीं करेगी ’ पर मैंने कुछ कहने के स्थान पर उन्हें अपनी बाहों में जोर से कस लिया।

‘मधुर, मैं आपको बिल्कुल भी कष्ट नहीं होने दूंगा! बस एक बार थोड़ा सा दर्द होगा मेरे लिए सहन कर लेना मेरी प्रियतमा!’

मैंने उनके होंठों पर एक चुम्बन ले लिया। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मेरा अनुमान था अब वो अपने ‘उसका’ मेरी ‘लाडो’ से मिलन करवा देंगे।

पर उन्होंने थोड़ा सा ऊपर खिसक कर तकिये के नीचे रखा कंडोम (निरोध) का पैकेट निकाला और उसे हाथ में मसलते हुए अनमने से होकर बोले ‘वो… वो… मैं निरोध लगा लूँ क्या?’

मैं जानती थी मधुर मिलन की प्रथम रात्रि में कोई भी पुरुष निरोध प्रयोग नहीं करना चाहता। यह नैसर्गिक (प्रकृतिवश) होता है। प्रकृति की बातें कितनी अद्भुत होती हैं। हर जीवधारी मादा के साथ संसर्ग करते समय अपना बीज (वीर्य) उसकी कोख में ही डालना चाहता है ताकि उसकी संतति आगे बढ़ती रहे।

‘ओह… प्रेम… कोई बात नहीं मैं पिल्स ले लूंगी…!’

उन्हें तो मेरी बात पर विश्वास ही नहीं हुआ। वो मुँह बाए मेरी ओर देखते ही रहे। फिर उन्होंने उस निरोध के पैकेट को फेंक दिया और मुझे बाहों में भर कर जोर से चूम लिया।

अब उनका एक हाथ मेरी लाडो के चीरे पर फिर से फिसलने लगा। मेरे चीरे के दोनों ओर की फांकें तो इतनी पतली हैं जैसे कोई कटार की धार हों। जी में आया कह दूँ ‘जनाब जरा संभल कर कहीं इस कटार जैसे पैनी फांकों से अपनी अंगुली ही ना कटवा लेना!’

पर मुझे लगा उनकी अँगुलियों में कुछ चिकनाई सी लगी है। ओह… मुझे तो बाद में समझ आया की उन्होंने अपनी अँगुलियों पर कोई सुगन्धित क्रीम लगा रखी है। उन्होंने अपने ‘उस’ पर भी जरूर क्रीम लगाई होगी।

फिर उन्होंने अपने मुन्ने को मेरी मुनिया (लाडो) के चीरे पर रख दिया। मैंने अपनी साँसें रोक ली और अपने दांत कस कर भींच लिए। मैंने मन में सोच लिया था मुझे कितना भी दर्द क्यों ना हो मैं ना तो चिल्लाऊँगी ना उन्हें परे हटाने का प्रयास करूंगी। मेरी लाडो तो कब से उनके स्वागत के लिए आतुर होकर प्रेम के आंसू बहाने लगी थी।

कई भागों में समाप्य!
आपका प्रेम गुरु
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