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केले का भोज-6

Kele Ka Bhoj-6

मेरी कहानी का पिछला भाग :- केले का भोज-5

ओ ओ ओ ओ ओ ह… खुद को शर्म में भिगोती एक बड़ी लहर, रोशनी के अनार की फुलझड़ी… आह..
एक चौंधभरे अंधेरे में चेतना गुम हो जाती है।
‘यह तो नहीं हुआ? वैसे ही अन्दर है !’… मेरी चेतना लौट रही है- अब क्या करोगी?’
कुछ देर की चुप्पी ! निराशा और भयावहता से मैं रो रही हूँ।

‘रोओ मत !’ सुरेश मुझे सहला रहा है, इतनी क्रिया के बाद वह भी थोड़ा-थोड़ा मुझ पर अधिकार समझने लगा है, वह मेरे आँसू पोंछता है- इतनी जल्दी निराश मत होओ।’ उसकी सहानुभूति बुरी नहीं लगती।
कुछ देर सोचकर वह एक आइडिया निकालता है। उसे लगता है उससे सफलता मिल जाएगी।

‘तुम मजाक तो नहीं कर रहे, आर यू सीरियस?’ नेहा संदेह करती है।
‘देखो, वेजीना और एनस के छिद्र अगल-बगल हैं, दोनों के बीच पतली-सी दीवार है। जब मैंने इसकी गुदा में उंगली घुसाई तो वह केले के दवाब से बहुत कसी लग रही थी।’

अब मुझे पता चला कि वह उंगली सुरेश की थी। मैं उसे नेहा की शरारत समझ रही थी।
‘तुम बुद्धिमान हो।’ नेहा हँसती है- मैंने तुम्हें बुलाकर गलती नहीं की।’

तो यह बहाने से मेरी ‘वो’ मारना चाह रहा है। गंदा लड़का। मुझे एक ब्लू फिल्म में देखा गुदा मैथुन का दृश्य याद हो आया। वह मुझे
बड़ा गंदा लेकिन रोमांचक भी लगा था- गुदा के छेद में तनाव। कहीं सुरेश ने मेरी यह कमजोरी तो नहीं पकड़ ली? ओ गॉड।

‘एक और बात है !’ सुरेश नेहा की तारीफ से खुश होकर बोल रहा था- शी इज सेंसिटिव देयर। जब मैंने उसमें उंगली की तो यह जल्दी ही झड़ गई।’
उफ !! मेरे बारे में इस तरह से बात कर रहे हैं जैसे कसाई मुर्गे के बारे में बात कर रहा हो।
‘तो तुम्हें लगता है शी विल इंजॉय इट।’
‘उसी से पूछ लो।’
नेहा खिलखिला पड़ी- निशा, बोलो, तुम्हें मजा आएगा?’

वह मेरी हँसी उड़ाने का मौका छोड़ने वाली नहीं थी। पर वही मेरी सबसे बड़ी मददगार भी थी।
चुप्पी के आवरण में मैं अपनी शर्म बचा रही थी। लेकिन केला मुझे विवश किए था। मुझे सहायता की जरूरत थी। मेरा हस्तमैथुन करके

उन दोनों की हिम्मत बढ़ गई थी। आश्चर्य था मैंने उसे अपने साथ होने दिया। अब तो मेरी गाण्ड मारने की ही बात हो रही थी।

मुझे तुरंत ग्लानि हुई ! छी: ! मैंने कितने गंदे शब्द सोचे। मैं कितनी जल्दी कितनी बेशर्म हो गई थी !
‘निशा, मजाक की बात नहीं। बी सीरियस।’ नेहा ने अचानक मूड बदल कर मुझे चेतावनी दी। उसका हाथ मेरे योनि पर आया और एक उंगली गुदा के छेद पर आकर ठहर गई।
‘तुम इसके लिए तैयार हो ना?’

मेरी चुप्पी से परेशान होकर उसने कहा- चुप रहने से काम नहीं चलेगा, यह छोटी बात नहीं है। तुम्हें बताना होगा तैयार हो कि नहीं। अगर तुम्हें आपत्ति्जनक लगता है तो फिर हम छोड़ देते हैं ! बोलो?’
मेरी चुप्पी यथावत् थी।

नेहा ने सुरेश से पूछा- बोलो क्या करें? यह तो बोलती ही नहीं।
‘क्या कहेगी बेचारी ! बुरी तरह फँसी हुई है। शी इज टू मच इम्बैरेस्ड !’ कुछ रुककर वह फिर बोला- लेकिन अब जो करना है उसमें पड़े रहने से काम नहीं चलेगा। उठकर सहयोग करना होगा।’

‘निशा, सुन रही हो ना। अगर मना करना है तो अभी करो।’
‘निशा, तुम… मैं नहीं चाहता, लेकिन इसमें तुम पर… कुछ जबरदस्ती करनी पड़ेगी, तुम्हें सहना भी होगा।’ सुरेश की आवाज में हमदर्दी थी। या पता नहीं मतलब निकालने की चतुराई।

कुछ देर तक दोनों ने इंतजार किया- चलो इसे सोचने देते हैं। लेकिन जितनी देर होगी, उतना ही खतरा बढ़ता जाएगा।’
सोचने को क्या बाकी था ! मेरे सामने कोई और उपाय था क्या?
मेरी खुली टांगों के बीच योनिप्रदेश काले बालों की समस्त गरिमा के साथ उनके सामने लहरा रहा था।
मैंने नेहा के हाथ के ऊपर अपना हाथ रख दिया- जो सही समझो, करो !

‘लेकिन मुझे सही नहीं लग रहा।’ सुरेश ने बम जैसे फोड़ा- मुझे लग रहा है, निशा समझ रही है कि मैं इसकी मजबूरी का नाजायज फायदा उठा रहा हूँ।’
बात तो सच थी मगर मैं इसे स्वीकार करने की स्थिति में नहीं थी। वे मेरी मजबूरी का फायदा तो उठा ही रहे थे।

‘खतरा निशा को है। उसे इसके लिए प्रार्थना करनी चाहिए। पर यहाँ तो उल्टे हम इसकी मिन्नतें कर रहे हैं। जैसे मदद की जरूरत उसे नहीं हमें है।’
उसका पुरुष अहं जाग गया था। मैं तो समझ रही थी वह मुझे भोगने के लिए बेकरार है, मेरा सिर्फ विरोध न करना ही काफी है। मगर यह तो अब…

‘मगर यह तो सहमति दे रही है !’, नेहा ने मेरे पेड़ू पर दबे उसके हाथ को दबाए मेरे हाथ की ओर इशारा किया। उसे आश्चर्य हो रहा था।
‘मैं क्यों मदद करूँ? मुझे क्या मिलेगा?’
सुनकर नेहा एक क्षण तो अवाक रही फिर खिलखिलाकर हँस पड़ी- वाह, क्या बात है !’

सुरेश इतनी सुंदर लड़की को न केवल मुफ्त में ही भोगने को पा रहा था, बल्कि वह इस ‘एहसान’ के लिए ऊपर से कुछ मांग भी रहा था। मेरी ना-नुकुर पर यह उसका जोरदार दहला था।
‘सही बात है।’ नेहा ने समर्थन किया।
‘देखो, मुझे नहीं लगता यह मुझसे चाहती है। इसे किसी और को ही दिखा लो।’

मैं घबराई। इतना करा लेने के बाद अब और किसके पास जाऊँगी। सुरेश चला गया तो अब किसका सहारा था?
‘मेरा एक डॉक्टर दोस्त है। उसको बोल देता हूँ।’ उसने परिस्थिति को और अपने पक्ष में मोड़ते हुए कहा।

मैं एकदम असहाय, पंखकटी चिड़िया की तरह छटपटा उठी। कहाँ जाऊँ? अन्दर रुलाई की तेज लहर उठी, मैंने उसे किसी तरह दबाया। अब तक नग्नता मेरी विवशता थी पर अब इससे आगे रोना-धोना अपमानजनक था।

मैं उठकर बैठ गई। केले का दबाव अन्दर महसूस हुआ। मैंने कहना चाहा- तुम्हें क्या चाहिए?’
पर भावुकता की तीव्रता में मेरी आवाज भर्रा गई।

नेहा ने मुझे थपथपाकर ढांढस दिया और सुरेश को डाँटा- तुम्हें दया नहीं आती?
मुझे नेहा की हमदर्दी पर विश्वास नहीं हुआ। वह निश्चय ही मेरी दुर्दशा का आनन्द ले रही थी।
‘मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए।’
‘क्या लोगे?’
सुरेश ने कुछ क्षणों की प्रतीक्षा कराई और बात को नाटकीय बनाने के लिए ठहर ठहरकर स्पष्ट उच्चारण में कहा- जो इज्जत इन्होंने केले को बख्शी है वह मुझे भी मिले।’

मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। अब क्या रहेगा मेरे पास? योनि का कौमार्य बचे रहने की एक जो आखिरी उम्मीद बनी हुई थी वह जाती रही। मेरे कानों में उसके शब्द सुनाई पड़े- और वह मुझे प्यार और सहयोग से मिले, न कि अनिच्छा और जबरदस्ती से।’

पता नहीं क्यों मुझे सुरेश की अपेक्षा नेहा से घोर वितृष्णा हुई। इससे पहले कि वह मुझे कुछ कहती मैंने सुरेश को हामी भर दी।

मुझे कुछ याद नहीं, उसके बाद क्या कैसे हुआ। मेरे कानों में शब्द असंबद्ध-से पड़ रहे थे जिनका सिलसिला जोड़ने की मुझमें ताकत नहीं थी। मैं समझने की क्षमता से दूर उनकी

हरकतों को किसी विचारशून्य गुड़िया की तरह देख रही थी, उनमें साथ दे रही थी। अब नंगापन एक छोटी सी बात थी, जिससे मैं काफी आगे निकल गई थी।
‘कैंची’, ‘रेजर’, ‘क्रीम’, ‘ऐसे करो’, ‘ऐसे पकड़ो’, ‘ये है’, ‘ये रहा’, ‘वहाँ बीच में’, ‘कितने गीले’, ‘सम्हाल के’, ‘लोशन’, ‘सपना-सा है’……… वगैरह वगैरह स्त्री-पुरुष की
मिली-जुली आवाजें, मिले-जुले स्पर्श।

बस इतना समझ पाई थी कि वे दोनों बड़ी तालमेल और प्रसन्नता से काम कर रहे थे।
मैं बीच बीच में मन में उठनेवाले प्रश्नों को ‘पूर्ण सहमति दी है’ के रोडरोलर के नीचे रौंदती चली गई। पूछा नहीं कि वे वैसा क्यों कर रहे थे, मुझे वहाँ पर मूँडने की क्या आवश्यकता थी।

लोशन के उपरांत की जलन के बाद ही मैंने देखा वहाँ क्या हुआ है। शंख की पीठ-सी उभरी गोरी चिकनी सतह ऊपर ट्यूब्लाइट की रोशनी में चमक रही थी।
नेहा ने जब एक उजला टिशू पेपर मेरे होंठों के बीच दबाकर उसका गीलापन दिखाया तब मैंने समझा कि मैं किस स्तर तक गिर चुकी हूँ। एक अजीब सी गंध, मेरे बदन की, मेरी उत्तेजना की, एक नशा, आवेश, बदन में गर्मी का एहसास… बीच बीच में होश और सजगता के आते द्वीप।

जब नेहा ने मेरे सामने लहराती उस चीज की दिखाते हुए कहा, ‘इसे मुँह में लो !’
कहानी जारी रहेगी।
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