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जिन्दगी के दो हसीन तोहफे-2

Jindagi Ke Do Haseen Tohfe-2

रेखा भाभी की चूत मेरे वीर्य से पूरी भर गई और भाभी ऐसे ही बेड पर लेट गई और मैं भाभी के ऊपर… कुछ देर हम दोनों ऐसे ही पड़े रहे, फिर भाभी ने मुझे अपने नंगे बदन के ऊपर से उठाया।

अभी हम दोनों अपने कपड़े ठीक कर ही रहे थे कि कमरे का दरवाजा एकदम से खुला।
दरवाजे पर प्रीति खड़ी थी।

प्रीति को देखते ही हम दोनों का रंग सफ़ेद पड़ गया।
रेखा का तो डर के मारे बुरा हाल हो गया, कुछ बोलते नहीं बन रहा था, हम दोनों की फटी पड़ी थी।

प्रीति ने कुछ नहीं कहा और वो दरवाजा बंद करके दूसरे कमरे में चली गई।
मैंने रेखा भाभी को समझाया कि वो डरे नहीं और प्रीति से बात करके उसे समझाए।

पर रेखा भाभी बहुत डर गई थी और बेड पर बैठ कर रोने लगी।

मैंने वहाँ से निकलना ठीक समझा क्यूंकि अगर कोई और भी आ जाता तो मामला ज्यादा बिगड़ सकता था।

मैं सीधा मामा के घर गया और ऊपर के कमरे में जाकर लेट गया और कुछ पल पहले बीते घटनाक्रम के बारे में सोचने लगा।

लेटे लेटे कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।

शाम को चार बजे संदीप ने आकर मुझे उठाया।
आँख खुलते ही संदीप को सामने देख कर एक पल के लिए तो मेरी फटी की कही प्रीति ने संदीप को कुछ बता तो नहीं दिया।

पर संदीप सामान्य लग रहा था, उसने मुझे उठाया और बोला- चल खेत में घूम कर आते हैं।

मैं बिना कुछ कहे उठा और चप्पल पहन कर उसके साथ चल दिया।

रास्ते में संदीप ने कोई खास बात नहीं की, बस कंपनी वालों को बुलाने के लिए गालियाँ देता रहा ‘छुट्टी की माँ चोद दी सालों ने!’

टहलते टहलते हम दोनों खेत में पहुँच गए, ट्यूबवेल चल रहा था तो दोनों कपड़े उतार कर होद में उतर गए।
आधा घंटा ट्यूबवेल के ठन्डे पानी में नहाने के बाद संदीप और मैं एक नीम के पेड़ के नीचे बैठ गए।

संदीप ने बातों बातों में ही बच्चे वाली बात छेड़ दी तो मुझे भी मौका मिल गया भाभी के प्लान पर काम करने का ‘यार संदीप… एक बात कहूँ अगर बुरा ना मानो तो?’

‘हाँ बोलो… बुरा क्यों मानूँगा।’

‘संदीप… शहर में मेरे जान पहचान का एक डॉक्टर है… अगर तुम कहो तो तुम दोनों के बारे में मैं उससे बात करूँ?’
‘क्या बात करोगे?’

‘अरे बात क्या करनी है बस सलाह ले लेंगे कि आखिर बच्चा क्यों नहीं हो रहा…’
संदीप पहले तो कुछ नहीं बोला…

फिर कुछ सोचते हुए बोला- राज… तू मेरा बचपन का यार है… मैं तुझसे कुछ छुपाना नहीं चाहता…’
‘आखिर बात क्या है… कहना क्या चाहते हो?’

‘राज… अभी कुछ समय पहले ही हम दोनों ने अपना टेस्ट करवाया था… तो…डॉक्टर ने बताया…’ संदीप बोलने में झिझक रहा था, उसे क्या पता था कि मैं सब कुछ जानता हूँ।

‘अरे बोल ना… क्या कहा डॉक्टर ने?’
‘राज… डॉक्टर मुझ में कमी बता रहे है… वो कहते हैं कि मेरे वीर्य में शुक्राणु नहीं है… बस इसीलिए मैं बाप नहीं बन सकता।’ कह कर संदीप रोने लगा।

‘क्या अनपढ़ वाली बातें कर रहे हो… आजकल किस चीज का इलाज नहीं है… तुम टेंशन मत लो… मैं बात करता हूँ अपने डॉक्टर दोस्त से!’
‘पर राज जिस डॉक्टर को हमने दिखाया था वो कह रहा था कि मेरी बिमारी का कोई इलाज नहीं है।’

‘माँ चुदाने दे तेरे वाले डॉक्टर को… मेरा एक डॉक्टर दोस्त है जो यौन समस्याओं का इलाज करता है, मैं उससे बात करता हूँ फिर हम देखते हैं कि क्या हो सकता है।’

मेरी बात सुनकर संदीप के चेहरे पर एक चमक सी आ आई… उम्मीद की किरण जो नजर आने लगी थी उसको।

कुछ देर बैठने के बाद हम दोनों वापिस घर आ गए।

शाम को बियर पीने का प्रोग्राम बना और फिर मैं, संदीप और सोनू तीनों बियर की बोतलें लेकर वापिस खेत में पहुँच गए।
देर तक ट्यूबवेल की होद में बैठे बियर पीते रहे और फिर घर वापिस आ गए।

मैं दिन में हुई घटना के बाद से रेखा भाभी से नहीं मिला था।
दिन में भाभी की चुदाई के बाद मेरे मन में भाभी की चूत ही घूम रही थी, मैं संदीप के साथ सीधा उसके घर ही चला गया।

दरवाजे में घुसते ही प्रीति मिली, वो बिना कुछ बोले अन्दर चली गई।

संदीप ने खाना लगाने के लिए रेखा भाभी को आवाज दी।

रेखा भाभी पहले पानी का गिलास लेकर आई और मुझे संदीप के साथ कमरे में देख कर वापिस चली गई।
संदीप उत्तेजित था यह सोच कर कि उसका इलाज हो जाएगा और वो भी बाप बन जाएगा, लोगों के ताने नहीं सुनने पड़ेंगे।
बार बार वो मुझे उस डॉक्टर के बारे में पूछ रहा था।

थोड़ी देर में दो थालियों में खाना लेकर प्रीति कमरे में आई, उसने संदीप को खाना पकड़ाया और एक थाली मेरे आगे रख कर बिना कुछ बोले चली गई।
मैंने चुपचाप खाना खाया और फिर मामा के घर जाकर सो गया।

अगले दिन सुबह जल्दी ही मैं वापिस शहर आ गया क्यूंकि मुझे ड्यूटी पर भी तो जाना था।

मुझे रेखा भाभी के साथ देखने के बाद प्रीति का बर्ताव एकदम से बदल गया था, प्रीति ने अब मुझ से बोलना कम कर दिया था।
अब वो मुझे जब भी मिलती उसकी नजरों में एक शिकायत सी महसूस होती थी, उसके दिल में मेरे लिए नफरत थी या कुछ और यह तब मुझे पता नहीं था।

खैर शहर आने के दो तीन दिन बाद ही रेखा भाभी का मुझे फ़ोन आया।
वो कुछ देर तो वो इधर उधर की बातें करती रही और फिर मुद्दे की बात पर आ गई- राज… तुमने क्या सोचा उस काम के बारे में?

‘मेरी जान… मैंने मेरे एक डॉक्टर दोस्त से बात तो की है पर वो अभी कुछ दिनों के लिए बाहर गया हुआ है, आते ही मैं उससे मिलकर कुछ प्लान बनाता हूँ।’

‘राज… उस दिन तुम संग हुए मिलन के बाद से मुझे हर पल तुम्हारी याद आती है… रात को जब संदीप के साथ होती हूँ तब भी तुम्हारा ही ख्याल दिमाग पर छाया रहता है… जल्दी से मिलने का कोई इंतजाम करो… अब मैं ज्यादा दिन इंतज़ार नहीं कर सकती।’

‘चिंता ना करो मेरी जान… मैं भी तुमसे दुबारा मिलने के लिए तड़प रहा हूँ… जल्दी ही कोई इंतजाम करता हूँ..’

‘जल्दी कुछ करो… मुझे जल्द से जल्द माँ बनना है बस…’

‘प्रीति के क्या हाल है… उसने कोई बखेड़ा तो नहीं किया ना?’

‘नहीं… उसने घर पर तो किसी को कुछ नहीं बताया पर मुझे जरूर कभी कभी ताने मार देती है…’
‘क्या कहती है?’

‘क्या कह सकती है… बस यही की संदीप भैया से आग ठंडी नहीं होती क्या जो राज भैया के साथ भी…’
‘फिर तुमने क्या कहा?’

‘मैंने उसको सच्चाई बता दी है पर वो मानने को तैयार नहीं है…’
‘चलो छोड़ो… मैं जल्दी ही कोई इंतजाम करके तुम्हें शहर बुलाता हूँ।’

फ़ोन कट होने के बाद बहुत देर तक मैं रेखा भाभी और प्रीति के बारे में सोचता रहा।

फिर मैंने एक डॉक्टर दोस्त को फ़ोन किया और उससे मिलने का समय लिया।
शाम को डॉक्टर से मिलकर मैंने सारी बात की और उसको सब कुछ समझाया। पहले तो मदद को तैयार नहीं था फिर जैसे तैसे करके उसको मनाया।

उससे समय तय करने के बाद मैंने संदीप को बताया तो वो बहुत खुश हुआ।
मेरे दोस्त डॉक्टर ने बताया कि ऐसी दवाई आती है जिससे शुक्राणु बनने शुरू हो जाते हैं और ऐसे कई मरीज वो ठीक कर चुका है और वो सब आज बाप बन चुके हैं।

मैं भी खुश था कि मेरे हाथों अगर एक दोस्त का भला हो जाए तो ख़ुशी की बात है।

मैंने संदीप को दो दिन बाद रेखा भाभी के साथ आने को कहा।
संदीप जो खुद बाप बनने को उतावला था, वो समय पर रेखा भाभी को लेकर मेरे कमरे पर आ गया।

कुछ जलपान करने के बाद हम तीनो मेरे डॉक्टर दोस्त के पास गए और उसने जांच करके कुछ दवाइयाँ उनको दे दी।
संदीप छुट्टी लेकर रेखा को वापिस गाँव में छोड़ने जाना चाहता था।

मैंने उसको समझाया कि रेखा भाभी मेरे कमरे पर रह लेंगी और तुम शाम को ड्यूटी से वापिस जाते हुए भाभी को ले जाना।
इस तरह छुट्टी भी बच जायेगी और काम भी हो जाएगा।

रेखा भाभी जो मुझ से चुद कर माँ बनने को बेचैन थी उसने भी मेरी हाँ में हाँ मिलाई और फिर संदीप रेखा भाभी को मेरे कमरे पर छोड़ कर अपनी ड्यूटी पर चला गया।

संदीप के जाते ही मैंने अपने ऑफिस में फ़ोन करके छुट्टी ले ली।

जैसे ही फ़ोन करके मैं वापिस अपने कमरे में आया तो देखा कि रेखा भाभी बेड पर लेटी हुई थी और अपनी बाहें फैला कर मुझे बुला रही थी।

मैंने भी बिना देर किये दरवाजा बंद किया और बेड पर जाकर रेखा भाभी को अपनी बाहों में भर लिया।
रेखा भाभी भी आँखें बंद करके मेरी बाहों में समा गई।

मैंने शुरुवात भाभी के रसीले होंठों पर एक जोरदार चुम्बन से की। भाभी ने भी चुम्बन का जवाब चुम्बन से दिया।
फिर ना जाने कितनी देर हम दोनों एक दूसरे को चूमते रहे।

वासना की आग भड़कने लगी थी, रेखा भाभी की चूत में भी पानी उतर आया था और मेरे लंड का तो पूछो ही मत। लंड अपनी पूरी औकात में आ गया था और तन कर कपडे फाड़ कर बाहर आने को बेताब हो रहा था।

पहली बार भाभी की चुदाई थोड़ी जल्दबाजी में हुई थी पर आज हमारे पास समय ही समय था। मैं आज भाभी के यौवन का अच्छे से मज़ा लेना चाहता था।

‘राज… अब और ना तड़पाओ… जल्दी से कुछ करो….’ भाभी ने बहुत ही मादक आवाज में कहा और फिर वो मेरी शर्ट उतारने में व्यस्त हो गई।

जब तक भाभी ने मेरी शर्ट उतारी मैंने भी भाभी के ब्लाउज के बटन खोल दिए और ब्रा में कसी चूचियों को मसलने लगा।

तभी भाभी ने मुझे बेड पर लेटा दिया और खुद मेरे ऊपर सवार हो गई।
मेरे ऊपर आते ही भाभी ने अपना खुला हुआ ब्लाउज उतार दिया और फिर ब्रा भी उतार कर अपनी नंगी चूची पकड़ कर मेरे मुँह पर लगा दी।

क्या तड़प थी रेखा भाभी में चुदने की… देख कर मेरा तो लंड फड़क उठा था।

मैंने भाभी की चूची को मुँह में भर लिया और चूसने लगा, कभी दाएँ वाली तो कभी बाएँ वाली… दोनों को चूस चूस कर लाल कर दिया। बीच बीच में चुचक को अपने दांतों से काट लेता तो भाभी की सिसकारी निकल जाती जिसे सुनकर मेरा जोश और बढ़ जाता।

इतना उतेजक माल आज बहुत दिनों बाद नसीब हो रहा था।

कुछ देर बाद भाभी नीचे उतरी और मेरी पैंट खोलने लगी। पैंट खोल कर भाभी ने उसे अंडरवियर सहित खींच कर उतार दिया।
मेरा फनफनाता लंड अब भाभी की आँखों के सामने था।
भाभी ने लंड को अपने कोमल कोमल हाथों में पकड़ कर सहलाना शुरू कर दिया।
लंड जो पहले से ही लोहे का बन चुका था भाभी के कोमल हाथों में आते ही झटके मारने लगा।

मैंने भाभी को लंड मुँह में लेकर चूसने को कहा तो उसने मना कर दिया।
उसने आज से पहले कभी लंड नहीं चूसा था।
मैंने भी कोई जोर जबरदस्ती नहीं की।

मैंने बिना देर किये भाभी की साड़ी और पेटीकोट उतार दिया।
भाभी ने पेंटी नहीं पहनी थी।

आज भाभी की गुलाबी चूत कुछ ज्यादा ही चमक रही थी, भाभी ने चूत को शेव किया हुआ था, चूत का एक भी बाल नहीं था, चूत की दरार किसी कुंवारी लड़की की चूत जैसी लग रही थी आज।

मैंने अपनी उँगलियों से चूत को खोला तो अन्दर से चूत एकदम गीली हो चुकी थी।
मैंने बिना देर किये चूत पर अपनी जीभ रख दी और चूत के अन्दर जीभ डाल डाल कर चूत चाटने लगा।

चूत चटाई से भाभी मस्त होकर आहें भरने लगी थी, भाभी की सिसकारियाँ कमरे के वातावरण को मादक बना रही थी।

मैंने चूत चाटते हुए ही लंड को भाभी के मुँह की तरफ कर दिया।
मैं चूत चाटता रहा और भाभी मेरे लंड को अपने हाथों में पकड़ कर मसलती रही।

फिर अचानक ही भाभी मेरे लंड को चाटने लगी।
भाभी की जीभ का एहसास लंड पर मिलते ही लंड मस्त हो गया और ठुमके मारने लगा।

कुछ देर जीभ से चाटने के बाद भाभी ने लंड का सुपाड़ा अपने होंठों में दबा लिया। मैं कुछ नहीं बोला, बस देखता रहा कि भाभी आगे क्या करती है।

कुछ देर होंठों में दबा कर जीभ से चाटने के बाद भाभी को भी शायद लंड का स्वाद अच्छा लगने लगा था तभी तो उसने अब मेरे लंड को मुँह में भर लिया था और जोर जोर से चूसने लगी थी।

भाभी के साथ साथ मैं भी अब तो सातवें आसमान पर था।
भाभी पहली बार लंड चूस रही थी पर जितना भी चूस रही थी मस्त चूस रही थी।

मेरे चूसने से भाभी की चूत बहुत पानी छोड़ रही थी जिससे मुझे चूत चाटने में बहुत मज़ा आ रहा था।

कुछ देर ऐसे ही चूसा चुसाई का प्रोग्राम चलता रहा और फिर भाभी का शरीर अकड़ा और वो मेरे मुँह पर ही झड़ गई।

झड़ने के बाद भाभी थोड़ी सुस्त हो गई थी पर मैंने चूत चाटना बंद नही किया था और ना ही भाभी ने मेरा लंड चूसना बंद किया था।

मुझे लगा कि अब एक राउंड तो मार लेना चाहिए क्यूंकि आज तो सारा दिन चुदाई ही चुदाई चलनी थी।

मैंने लंड भाभी के मुँह से आजाद किया और भाभी को सीधा लेटाया और उसके होंठ चूसने लगा।

भाभी की चूचियाँ एकदम तन कर खड़ी थी, मैंने भाभी की चूची के चूचुक को मुँह में दबा लिया।

‘राज… अब जल्दी से डाल दो… अब और इंतज़ार नहीं होता… डाल दो जल्दी…’

मैं तो खुद पहले से चोदने को बेकरार था, मैंने लंड का सुपाड़ा भाभी की चूत पर रखा और भाभी के होंठ चूसते हुए एक जोरदार धक्के के साथ आधे से ज्यादा लंड भाभी की चूत में उतार दिया।

‘आह्ह्ह… मर गई… धीरे…’ भाभी कसमसाई पर मैंने बिना देर किये दूसरा धक्का लगा कर पूरा लंड चूत में फिट कर दिया। दुसरे धक्के में लंड जाकर सीधा बच्चादानी से टकराया था।

भाभी एकदम से उचक कर मुझ से लिपट गई। मैंने भाभी का खूबसूरत बदन अपनी बाहों में भर लिया और जोरदार चुदाई शुरू कर दी।

लंड अब सटासट चूत में आ जा रहा था, भाभी आहें भर रही थी, उसकी सिसकारियाँ कमरे में गूंज रही थी- जोर से… और जोर से… आह्ह्ह्ह… मज़ा आ गया राज… जोर से चोदो… ऐसे ही फाड़ दो मेरी चूत… आह…सीईई… आह्ह…’

मैं बिना कुछ बोले अपने पूरे दम के साथ उसकी चूत चोदता रहा।
कुछ देर के बाद मैंने भाभी को घोड़ी बना कर चोदना शुरू किया।
समय का पता ही नहीं चला और करीब आधा घंटा तक मैं भाभी की अलग अलग तरीके से चोदता रहा, भाभी कम से कम तीन चार बार झड़ चुकी थी और अब मेरे लंड को अपनी चूत के अन्दर निचोड़ने की कोशिश कर रही थी।

आधे घंटे बाद वो अपनी कोशिश में कामयाब हुई और मेरे लंड से लावा फ़ूट पड़ा और उसकी चूत भरने लगा।

चूत वीर्य से लबालब भर गई थी।
करीब दस मिनट हम दोनों एक दूसरे को अपनी बाहों में लपेटे पड़े रहे। फिर जब लंड सुकड़ कर चूत से बाहर निकला तो ही हम अलग हुए।

भाभी के चेहरे पर पूर्ण संतुष्टि के भाव थे, वो मुझसे चुदवा कर बहुत खुश थी।

उस दिन चार बार चुदाई के बाद शाम को करीब छ: बजे संदीप भाभी को लेकर गाँव चला गया।

कहानी जारी रहेगी।
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