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जिन्दगी के दो हसीन तोहफे-1

Jindagi Ke Do Haseen Tohfe-1

कैसे हो दोस्तो,
मैं आपका दोस्त राज एक बार फिर से आप सबके लिए एक रोमांचक कहानी लेकर आया हूँ।

वैसे पहले तो मेरा मन नहीं था यह कहानी लिखने का… पर फिर सोचा कि नाम बदल कर लिखने में कोई बुराई नहीं।

अन्तर्वासना पर कहानी तो हम मजा लेने के लिए ही लिखते और पढ़ते हैं। कोई भी सच्ची घटना/कहानी को मनोरंजन के लिए चटपटी बनाना और फिर पढ़ कर मजे लेना, ऐसा ही तो होता है।
किसी को बदनाम करना या किसी का मजाक उड़ाना तो उद्देश्य नहीं होता।
चलो छोड़ो ये सब… बस पढ़ने वाले को मज़ा आना चाहिए।

आज की कहानी की घटना बिल्कुल सत्य है, बस कुछ मसाला मैंने अपनी तरफ से मिलाया है आपके मनोरंजन के लिए।

कहानी मेरे एक दोस्त के परिवार से सम्बंधित है। नाम कुछ भी रख लो, नाम में क्या रखा है।
चलो उसको संदीप के नाम से बुलाते हैं।

संदीप मेरे मामा के गाँव में रहता था और मेरे मामा के लड़के के साथ उसकी अच्छी दोस्ती थी। बस यही कारण था कि वो मेरा भी दोस्त बन गया।

उसके परिवार में माँ-बाप, एक बहन और उसकी बीवी ही थे।
संदीप शहर में एक कंपनी में नौकरी करता था।

मैं जब भी मामा के घर जाता तो मैं, मेरे मामा का लड़का और संदीप तीनों की तिकड़ी बन जाती और फिर खेतों में घूमना, ताश खेलना, और अगर मौका लगे तो शाम को बियर या एक दो पेग शराब का लगाना, बस यही सब कुछ होता था।

मेरे मामा के लड़के की शादी और उसकी शादी एक ही दिन हुई थी आज से लगभग दस साल पहले!

मैंने दोनों शादियों में बहुत मज़ा किया था। मामा के घर में राजा तो था ही मैं, संदीप के घर में भी मेरी बहुत खातिरदारी हुई थी।

आज से लगभग तीन साल पहले की बात है…
मैं मामा के घर गया हुआ था। मामा के लड़के के यहाँ दूसरा बेटा हुआ था तो उसका जश्न था।

दिन भर मस्ती की और फिर शाम को मैं और संदीप खेतों की तरफ घूमने चल दिए।

‘यार संदीप… क्या बात है, तेरी और सोनू (मेरे मामा का लड़का) की शादी एक साथ हुई थी। वो तो दो बच्चो का बाप बन गया, तू कैसे पीछे रह गया यार…’
मेरा ऐसा पूछना था कि वो भावुक हो गया और उसकी आँखें नम हो गई।

एक बार तो मुझे लगा जैसे मैं पूछ कर गलती कर दी, पर फिर मन में आया कि दोस्त है मेरा और पूछना मेरा फर्ज बनता है।

‘राज… छोड़ ना इस बात को… भगवान की जब मर्जी होगी, औलाद भी हो जायेगी!’ संदीप ने टालते हुए कहा।

संदीप का मूड थोड़ा ख़राब हो गया था तो थोड़ी देर ऐसे ही घूम कर हम वापिस घर आ गए।

घर आने के बाद रात को दारु का प्रोग्राम भी था तो जितने लोग आये हुए थे और जो पीते थे सब बोतल खोल कर बैठ गये।

हमारी तिकड़ी भी एक बोतल लेकर घर की छत पर बैठ गई और तीनों पीने लगे।

तीन तीन पेग अन्दर जा चुके थे, नशा हावी होने लगा था।
अचानक नशे में संदीप शाम वाली बात को लेकर रोने लगा।

सोनू और मैंने बहुत समझाया पर वो औलाद ना होने के कारण दुखी होकर रोने लगा- यार… सबके घर में बच्चो की किलकारियाँ गूंजने लगी है.. बस एक मेरे ही घर में पता नहीं भगवान क्यों तरस नहीं खा रहा!

संदीप बहकने लगा था। हमने मना भी किया पर फिर भी उसने दो पेग और चढ़ा लिए।

बड़ी मुश्किल से सोनू और मैं उसको उसके घर छोड़ने गए, संदीप की पत्नी रेखा ने दरवाजा खोला।

वैसे तो मैं अनगिनत बार संदीप के घर गया था और रेखा को देखा भी था और उससे बातें भी की थी, एक बार तो होली भी खेली थी।
पर आज शराब के नशे में देखा तो रेखा मुझे फ़िल्मी हीरोइन रेखा से किसी भी दृष्टि से कम नहीं लगी।
साढ़े पांच फुट का लम्बा कद, उफनती हुई बड़ी बड़ी चूचियाँ, मस्त गोरा पेट, पतली कमर और साड़ी में कसे मस्त मोटे चूतड़।

मेरा तो कभी इस हुस्न की मल्लिका पर ध्यान ही नहीं गया था।

संदीप लड़खड़ा रहा था तो एक तरफ से मैं सहारा दे रहा था और दूसरी तरफ से रेखा ने संदीप को पकड़ लिया।

पी मैंने भी रखी थी तो थोड़ी सी लड़खड़ाहट मेरी चाल में भी थी।

तभी सोनू को किसी ने आवाज दी और वो हमें छोड़ कर चला गया।

संदीप अब हम दोनों से संभल नहीं रहा था फिर भी किसी तरह रेखा और मैं उसको लेकर कमरे में चले गए।
कमरे में बेड के पास जाते ही संदीप एकदम से लड़खड़ा कर बेड पर गिर गया और उसी झोंक में रेखा भी बेड पर गिर गई।

जब तक मैं अपने आप को संभालता, मैं भी लड़खड़ाया और बेड पर सीधा रेखा के ऊपर गिर गया।
रेखा का कोमल बदन एकदम से मेरे नीचे दब गया।

मैं उठने की कोशिश करने लगा और रेखा भी मुझे उठाने लगी।

इसी बदहवासी में मेरे हाथ ना जाने कब रेखा की चूचियों पर चले गए।
कोमल चूचियों का एहसास मिलते ही मेरे दिमाग की घंटियाँ बज उठी।
क्या मोटी मोटी और कसी हुई चूचियाँ थी रेखा भाभी की।

मैं संभला और कोशिश करके उठ गया।
रेखा ही मुझे गेट तक छोड़ने आई और फिर मैं घर आकर सो गया।

अगले दिन सुबह देर से उठा और फिर नहा-धो कर सीधा संदीप के घर चला गया।

संदीप की माँ मेरे मामा के घर आई हुई थी और बापू खेत में जा चुका था।

अन्दर घुसते ही सबसे पहले रेखा से सामना हुआ।
मैंने भाभी से संदीप का पूछा तो उसने बताया कि वो अभी तक सो रहे हैं।

‘भाभी… गलत मत समझना.. रात वाली बात के लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ… मैंने जानबूझ कर कुछ नहीं किया था।’
‘कोई बात नहीं… ऐसा हो जाता है कभी कभी… तुम टेंशन मत लो…’ कह कर वो थोडा मुस्कुराई और अन्दर रसोई में चली गई।

मैं भी सीधा संदीप के कमरे में चला गया।

संदीप बेड पर सिर्फ अंडरवियर पहने सो रहा था, समझ में आया कि जरूर नशे की हालत में संदीप ने रेखा भाभी को तंग किया होगा।
मैंने संदीप को हिला हिला कर उठाया।
उठते ही वो सर पकड़ कर बैठ गया।

‘यार राज… रात तो बहुत ज्यादा हो गई थी… अभी तक सर में दर्द है।’

‘चल कोई बात नहीं… खड़ा हो खेतों में चलते हैं… थोड़ा घूम कर आयेंगे तो ठीक हो जाएगा।’

संदीप का मन तो नहीं था पर फिर भी वो उठा और अपना पजामा कुरता पहन कर मेरे साथ चल पड़ा।

हम दोनों गाँव से बाहर जाकर खेतों में एक बने एक कमरे के बाहर बैठ गए।
ट्यूबवेल चल रहा था, संदीप बोला- नहा लेता हूँ, थोड़ा नशा ढीला हो जाएगा।

फिर वो अपने कपड़े उतार कर ट्यूबवेल के नीचे बैठ गया।

अनायास ही मेरा ध्यान उसके लंड की तरफ चला गया जो अंडरवियर में तन कर खड़ा था।
दिमाग में आया कि जब मस्त लंड है इसके पास तो बच्चा क्यों नहीं हो रहा है।
छ: सात इंच लम्बा तो था उसका और मोटा भी ठीक लग रहा था।

लगभग एक घंटा खेत में बैठने के बाद हम दोनों घर आ गए।

अगले दिन रविवार था तो मैंने रुकने का प्रोग्राम बना लिया था। खाना मैंने संदीप के साथ उसके घर पर ही खाया।
रेखा भाभी और संदीप की बहन प्रीति खाना ला ला कर दे रही थी।

खाना खाते खाते मुझे रात की बात याद आई और मेरा ध्यान रेखा भाभी पर अटक गया।

भाभी ने नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी जो उस पर बहुत अच्छी लग रही थी।

ब्लाउज में कसी चूचियों पर ही मेरा ज्यादा ध्यान था क्यूंकि रात इन्हीं मुलायम चूचियों को तो हाथ लगा कर देखा था।

रेखा भाभी ने शायद मेरी नजर को पढ़ लिया था तभी तो वो भी बार बार मेरी तरफ देख रही थी।

मेरी नजर का पीछा करते हुए जब रेखा भाभी ने देखा कि मैं उनकी मस्त चूचियों पर नजर जमाये हुए हूँ तो उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए अपनी चूचियों को ढक लिया।

तब तक मैं खाना खा चुका था, मैं उठा और मामा के घर जाकर सो गया।

शाम के समय मैं फिर संदीप के घर की तरफ चल दिया। जैसे ही गेट पर पहुँचा तो देखा रेखा भाभी और प्रीति दोनों खेत में जाने की तैयारी कर रही थी।

संदीप के पिता जी ने खेत में सब्जियाँ लगाईं हुई थी, दोनों वही तोड़ने जा रही थी।

मुझे लगा मौका अच्छा है तो मैं बाइक उठा कर उनसे पहले ही खेत में पहुँच गया।

मन में गलत कुछ नहीं था बस एक तो रेखा भाभी से बात करना चाहता था और साथ ही भाभी के हुस्न का अपनी नजरों से रसपान करना चाहता था।

‘अरे अभी तो तुम गाँव में घर के बाहर थे और इतनी जल्दी खेत में भी पहुँच गए?’ भाभी ने मुझे खेत में देखते ही कहा।

‘बस भाभी खेतों की हरियाली शहरों में तो मिलती नहीं है तो सोचा कि गाँव की साफ़ सुथरी हवा और हरियाली का मज़ा लिया जाए!’

बस ऐसे ही बैठे बैठे हम दोनों बातें करते रहे और प्रीति खेत में से सब्जियाँ इकट्ठी करती रही।

मेरे मन में बार बार आ रहा था कि बच्चे वाली बात करूँ या ना करूँ।
फिर मैंने हिम्मत करके पूछ ही लिया- भाभी.. एक बात पूछूँ अगर बुरा ना मानो तो?
‘क्या?’

‘भाभी.. आठ साल हो गए तुम्हारी शादी को पर अभी तक बच्चा नहीं हुआ, क्या बात है… संदीप में कुछ कमी है क्या… या…’

मेरी बात सुनते ही रेखा भाभी कुछ उदास हो गई और उसकी आँखें नम हो गई, उसने कोई जवाब नहीं दिया।

मैंने जब दुबारा वही सवाल किया तो भाभी बोली– राज… प्लीज कुछ और बात करें.. मैं पहले ही इस बात पर ताने सुन सुनकर परेशान हो चुकी हूँ… मुझे इस बारे में कोई बात नहीं करनी है!

‘भाभी… देवर तो दोस्त समान होता है… अगर अपना दुःख देवर से साँझा नहीं करोगी तो किससे करोगी.. मैंने संदीप से भी बात की थी वो भी इस बात को लेकर बहुत परेशान है।’
भाभी चुप रही।

‘प्लीज भाभी… कुछ तो बोलो… अगर संदीप में कोई प्रॉब्लम है तो हम उसका इलाज करवा सकते हैं।’

भाभी फिर भी चुप रही, बस उसकी आँखों से आँसू जरूर बहने लगे थे।

‘प्लीज भाभी कुछ तो बोलो..’
‘राज… संदीप कभी बाप नहीं बन सकता… उसके अन्दर बच्चा पैदा करने वाले शुक्राणु ही नहीं हैं।’
‘क्या…?!’

‘हाँ… यह सच है… वो मुझे कभी माँ नहीं बना सकता… पिछले महीने ही हम दोनों ने अपने अपने टेस्ट करवाए थे तो डॉक्टर ने बताया था कि वो कभी बाप नहीं बन सकता।’

मैं बहुत हैरान परेशान हो गया था।
एक हसीन खूबसूरत औरत खुद ताने सह रही है जबकि कमी उसमें नहीं उसके पति में है।

‘यह बात संदीप को पता है?’
‘हाँ.. डॉक्टर ने हम दोनों को बैठा कर ही यह बात बताई थी।’
मैं सोच में पड़ गया।

‘जानते हो राज… संदीप की माँ ने ताने मार मार कर मेरा जीना हराम किया हुआ है… और संदीप सब कुछ पता होते हुए भी कुछ नहीं कहता… कितना घुट घुट कर जी रही हूँ मैं।’ कहकर रेखा फ़ूट फ़ूट कर रो पड़ी।

मैंने उसको चुप करवाने के लिए उसके कंधे पर हाथ रखा तो वो मेरे गले लग कर रोने लगी।

मैं उसको चुप करवाने की कोशिश करता रहा।
मुझे यह भी डर था की कहीं प्रीति हमें ना देख ले।

‘भाभी चुप हो जाओ… प्रीति आती ही होगी… वो तुम्हें रोते देखेगी तो वो पता नहीं क्या समझेगी।’

शायद रेखा को भी ध्यान आ गया कि प्रीति वहाँ है सो वो चुप हो गई और ट्यूबवेल पर जाकर मुँह धोकर आ गई।

‘भाभी.. आजकल तो बहुत से तरीके हैं इलाज के शहरों में, तो तुम वो क्यों नहीं आजमा लेती.. डॉक्टर किसी और के वीर्य से तुम्हें गर्भवती बना सकते हैं।’

‘राज… जब संदीप के शुक्राणु ही नहीं है.. तो उन तरीकों से भी क्या होगा।’

‘भाभी… देखो जब संदीप को भी यह सब पता है तो और कोई चारा भी तो नहीं है… दूसरा रास्ता अपनाने से तो यह सही है।’

‘दूसरा कौन सा रास्ता है?’

जब भाभी ने पूछा तो मैं एक बार तो सकपका गया।
फिर हिम्मत करके बोला कि किसी दूसरे से सम्बन्ध बना कर माँ बनने से तो डॉक्टर से इलाज करवाने वाला सही है।

‘नहीं… मुझे किसी और के वीर्य से माँ नहीं बनना है… डॉक्टर पता नहीं किसके वीर्य से मुझे प्रेगनेंट करें… ऐसे ही कैसे मैं किसी के भी वीर्य को अपनी कोख में डलवा सकती हूँ!’

‘वो तो तुम अपनी पसंद के किसी का भी वीर्य ले सकती हो… चाहो तो मैं अपना वीर्य तुम्हें दे सकता हूँ… और तुम अगर मेरे वीर्य से माँ बन जाओ तो संदीप से भी ज्यादा ख़ुशी तो मुझे होगी।’

मेरी बात सुनकर भाभी चौंक गई और अजीब सी नजरों से मुझे घूरने लगी।

एक बार के लिए तो मुझे लगा की कही भाभी बुरा ना मान जाए।

‘इसके लिए तुम संदीप से ही बात करो तो अच्छा है।’
‘तुम्हें तो कोई ऐतराज नहीं है ना?’

भाभी ने कोई जवाब नहीं दिया।

मैं बात कुछ आगे बढ़ाना ही चाहता था कि प्रीति आ गई, फिर वो दोनों सब्जियाँ लेकर घर चली गई।
मैं आधा घंटा और वहीं बैठा और फिर उठ कर घर चला गया।

दिल में बेचैनी हो रही थी कि कहीं भाभी ने संदीप को बोल दिया और संदीप बुरा मान गया तो क्या होगा।
अगर संदीप मान गया तो क्या होगा।

बस यही सब सोचते सोचते कब आठ बज गए पता ही नहीं चला।

गाँव में अक्सर लोग जल्दी ही खाना पीना कर लेते हैं, मामी ने मुझे खाना लगा कर दिया।
मैंने खाना खाया और फिर घर के बाहर टहलने लगा।

ऐसे ही टहलते टहलते कब मैं संदीप के घर पहुँच गया मुझे खुद नहीं पता लगा।

मैंने गेट खोला और अन्दर चला गया।

अन्दर घुसते ही सबसे पहले रेखा भाभी से ही सामना हुआ।
उसके चेहरे पर अब उदासी के भाव नजर नहीं आ रहे थे, आँखों में अलग सी चमक थी जो मुझे देख कर कुछ बढ़ गई थी।
ऐसा मुझे महसूस हुआ।

मैंने संदीप का पूछा तो उसने बताया कि वो कमरे में है।

मैं कमरे में जाने लगा तो मैंने गौर किया कि भाभी की नजरें मुझ पर ही टिकी हुई थी, चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी।

मैं कुछ देर संदीप के पास बैठ कर इधर उधर की बातें करता रहा।
भाभी इस दौरान दो तीन बार कमरे में आई। फिर संदीप को और मुझे एक एक दूध का गिलास पकड़ा कर चली गई।

मैं भी कुछ देर और वहाँ बैठा और फिर उठ कर मामा के घर आ गया।

रेखा भाभी मुझे गेट तक छोड़ने आई थी पर वो बोली कुछ नहीं।

अगले दिन रविवार था। संदीप और सोनू दोनों की ही छुट्टी थी, तीनों सुबह सुबह ही नहर पर नहाने चले गए।

लगभग ग्यारह बजे वापिस आये तो मेरा मन विचलित था रेखा भाभी से मिलने के लिए।
मैंने जल्दी से अपने कपड़े बदले और संदीप के घर चला गया।

वहाँ मुझे पता लगा कि संदीप की कंपनी से किसी का फ़ोन आया था तो वो शहर चला गया है।
रेखा भाभी घर पर अकेली थी।
बाकी लोगों के बारे में पूछा तो पता चला कि वो सब खेत में गए हैं।

रेखा भाभी से बात करने का सुनहरा मौका था, मैंने बिना देर किये बात शुरू कर दी और पूछा कि उसने संदीप से बात की है या नहीं।उसका जवाब सुनकर मैं हैरान रह गया।

‘राज.. मैंने संदीप से कोई बात नहीं की है.. पर मैंने तुम्हारी बात पर बहुत सोचा। संदीप कभी भी यह पसंद नहीं करेगा कि मैं किसी और के वीर्य से माँ बनूँ। चलो हो सकता है वो आज ये मान भी जाए पर सारी उम्र वो उस बच्चे को दिल से अपना नहीं पायेगा।’

‘तो भाभी इसका इलाज क्या है?’
‘मैंने एक प्लान बनाया है… अगर तुम्हे ठीक लगे तो… पर तुम ये प्लान किसी को नहीं बताओगे… संदीप को भी नहीं!’

‘पर प्लान क्या है…’
‘राज… तुम शहर में रहते हो… और संदीप भी शहर जाता है… तो तुम उसको अपनी जान-पहचान के किसी डॉक्टर के पास ले जाओ… डॉक्टर को बोलो कि वो संदीप को कोई दवाई दे और कहे कि इससे उसके वीर्य में शुक्राणु बनने शुरू हो जायेगें। फिर किसी दिन मैं भी शहर आकर तुम्हारे वीर्य को अपनी कोख में डलवा लूँगी जिससे मैं भी माँ बन जाऊँगी और संदीप को भी शक नहीं होगा।’

मैं हैरान होकर भाभी को देखता रहा।

औरतों की माँ बनने की चाहत क्या कुछ नहीं करवा देती औरत से!

यह सोच कर तो मेरी हालत और भी ख़राब हो गई कि रेखा भाभी भी मेरे वीर्य से बच्चा पैदा करना चाहती है।
मैं सोच में डूबा था कि भाभी ने मुझे कंधे से पकड़ कर हिलाया।

मैं तो जैसे नींद से जागा, अचानक मुझे पता नहीं क्या हुआ और मैंने रेखा भाभी को बाहों में भर लिया और उनके रसीले होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

रेखा भाभी एक पल के लिए तो सकपकाई पर फिर तुरन्त ही मेरे चुम्बन का जवाब चुम्बन से देने लगी।
हम दोनों ही एक अलग दुनिया में पहुँच चुके थे।

कब होंठों को चूसते चूसते मेरे हाथ रेखा भाभी के गदराये बदन पर घूमने लगे और कब उसकी मुलायम मुलायम चूचियाँ मेरे हाथों में समा गई पता ही नहीं चला।

साड़ी का पल्लू नीचे सरक चुका था और ब्लाउज में कसी मस्त चूचियाँ मेरी आँखों के सामने थी।

मैं लगातार भाभी के होंठों पर, गर्दन पर और कानों की लटकन पर चूम रहा था और भाभी भी आँखें बंद किये मस्त होकर मेरा साथ दे रही थी।

मैंने ब्लाउज के दो बटन खोल दिए और भाभी की एक चूची को ब्लाउज के साइड से बाहर निकाल लिया। भाभी की एक चूची मेरे सामने अकड़ कर खड़ी थी।

भाभी ने ब्रा नहीं पहनी थी फिर भी भाभी की चूचियाँ एकदम तन कर खड़ी थी।

मैंने भाभी की चूची को मुँह में भर लिया और चूसने लगा।
यही वो क्षण था जब रेखा भाभी का हाथ मेरे लंड पर पहुँच गया और पैंट के ऊपर से ही मेरे लंड को सहलाने लगा।

मैंने भी देर नहीं की और रेखा भाभी की चूत को साड़ी के ऊपर से ही हाथ में पकड़ कर दबोच लिया।
रेखा भाभी की सिसकारियाँ कमरे में गूंजने लगी थी- ‘राज, यह क्या कर दिया… तुमने तो तन-बदन में आग लगा दी राज…’

मैंने कोई जवाब नहीं दिया और भाभी को उठा कर बेड पर लेटा दिया।
बेड पर लेटते ही भाभी की साड़ी कुछ खुद ही ऊपर हो गई बाकी मैंने ऊपर कर दी।

साड़ी ऊपर करते ही भाभी की गुलाबी चूत मेरी आँखों के सामने थी। चूत पानी छोड़ रही थी। मैं चूत का रसिया अपने आप को रोक नहीं पाया और मैंने अपने होंठ रेखा भाभी की चूत पर लगा दिए।

‘आह्ह्ह… राज…. ये क्या कर रहे हो… मुँह मत लगाओ… आह्ह्ह राज…. मैं मर जाऊँगी… मत करो… उम्म्म्म बहुत मज़ा आ रहा है राज… ओह्ह्ह… उम्म्म… आह्ह्ह…. सीईई… आह्ह्ह…’

मैं चुपचाप रेखा भाभी की चूत को चाटता रहा, भाभी की चूत बहुत पानी छोड़ रही थी, शायद वो मुझसे चुदने को बेचैन थी।

‘राज… जो करना है जल्दी से कर लो… अगर कोई आ गया तो…’

मैंने भी मौके की नजाकत को समझा और अपना तनतनाया हुआ लंड पैंट से निकाल कर सीधा भाभी की चूत पर रख दिया।

भाभी की मुँह से भी वही शब्द निकले जो मैं ना जाने पहले भी कितनी बार सुन चुका था- ‘राज… तुम्हारा तो बहुत बड़ा और मोटा है… संदीप से भी मोटा…’

अपने लंड की तारीफ़ सुनकर मैंने जोश में एक जोरदार धक्का लगा दिया। रेखा भाभी दर्द के मारे छटपटा उठी- आह्ह्हह्ह… धीरे राज… फाड़ ही डालोगे क्या…’

धक्का बहुत जोरदार था तभी तो लगभग आधा लंड चूत के अन्दर था।
मैंने एक और जोरदार धक्का लगाया तो पूरा लंड चूत में समा गया।

पूरा लंड जाते ही मैंने भाभी के होंठों को चूसना शुरू कर दिया और धीरे धीरे धक्के लगाने लगा।

कुछ ही पल बाद भाभी भी अपनी गांड उछाल उछाल कर लंड को चूत में लेने लगी, फिर तो धुआँधार चुदाई शुरू हो गई।

‘आह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह… उम्म्म्म… राज… मैंने अपना सब कुछ तुम पर लुटा दिया है… मुझे प्यासी मत छोड़ना… मुझे बस माँ बनना है… मुझे अपने बच्चे की माँ बना दो… सीईई… आह्ह्ह… जोर से… और जोर से चोदो राज… अपना वीर्य डाल दो मेरी बच्चादानी में…’

मैं चुपचाप रेखा भाभी की टांगें अपने कंधे पर रख कर अपने पूरे जोश में लंड उसकी चूत में पेल रहा था।
रेखा भाभी की चूत पानी पानी हो रही थी।
कमरे में फच्च… फच्च… की आवाजे गूंज रही थी।

मैं बीच बीच में भाभी के अधखुले ब्लाउज से बाहर निकली चूचियों को मसल देता या उनको चूसने लगता पर चुदाई एक्सप्रेस अपनी पूरी गति से चल रही थी।

लगभग दस मिनट बाद मैंने भाभी को घोड़ी बनाया और पीछे से लंड चूत में उतार दिया और फिर से चुदाई शुरू हो गई।

भाभी दो बार झड़ चुकी थी और बेसब्री से अपनी चूत में मेरे वीर्य का इंतज़ार कर रही थी।

मैं भी अब झड़ने की कगार पर था, मैंने झुक कर भाभी की दोनों चूचियों को हाथों में पकड़ा और झुक कर जोरदार धक्के लगाने शुरू कर दिए।
धक्कों की रफ़्तार इतनी तेज थी कि भाभी कुछ बोल भी नहीं पा रही थी।

लगभग दो मिनट में ही मेरे लंड ने वीर्य की पिचकारियाँ रेखा भाभी की चूत में चलानी शुरू कर दी और ढेर सारा वीर्य भाभी की चूत में भरता चला गया।

पता नही क्यों, पर आज और दिनों से ज्यादा वीर्य निकला था मेरे लंड से, भाभी की चूत वीर्य से लबालब भर गई थी।
भाभी ऐसे ही बेड पर लेट गई और मैं भाभी के ऊपर… कुछ देर हम दोनों ऐसे ही पड़े रहे।

फिर भाभी ने मुझे अपने ऊपर से उठाया।

कहानी जारी रहेगी।
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