Antervasna - Hindi Sex Stories | नई हिन्दी सेक्स कहानियाँ

रोज नई नई गर्मागर्म सेक्सी कहानियाँ Only On Antervasna.Org

जमींदार का कर्ज ना चुका पाने का दण्ड चूत चुदाई-2

Jamindar Ka Karz Na Chuka Pane Ki Saja Chut chudai- Part 2

जमींदार का कर्ज ना चुका पाने का दण्ड चूत चुदाई-1

जैसे ही वो आँख बचाकर मालिक के मोटे लंड की तरफ देखती तो जमींदार चालाकी से उसे झटके से हिला देता, वो शरमा कर मुंह फेर लेती।

ऐसे ही जब दूसरी तरफ मुह किये जब सुनीता मालिक की मालिश कर रही थी तो गलती से उसका हाथ मालिक के लंड से लग गया, उसने झटके से हाथ पीछे खींच लिया।
यह सब जमींदार भी देख रहा था।

लंड के हाथ से छूते ही सुनीता की काम अग्नि भड़क उठी, उसने अपनी चूत में गीलापन महसूस किया।

जमींदार कामुक मुस्कान दिए- क्या हुआ सुनीता?
सुनीता- कुछ नहीं मालिक।
और वो अपना मुंह दूसरी ओर करके मन में सोचने लगी कि कैसी अजीब हालात में फंस गई हूँ, मुझे क्या हो रहा है?
अंडरवियर के अंदर से ही उसके साइज़ का अंदाज़ा लगाया जा सकता था जो लगभग 8 इंच लम्बा और 3 इच मोटा होगा।

आखिर आग से पास घी कब तक ठोस रहता, काफी समय से खुद पे नियंत्रण बनाये बैठी सुनीता का सब्र अब जवाब देने लगा, जिस लंड को देखकर वो बार बार नज़र चुरा रही थी, अब टकटकी लगाकर उसे ही देख रही थी, अब काम वेग उसकी आँखों से झलक रहा था।
काम के अधीन होकर वो बहक गई और मन में सोचने लगी कि क्यों न इसका स्वाद चख लिया जाये… वैसे भी मालिक भी तो यही चाहता है, हो सकता है मेरे ऐसा करने से मुझे क़र्ज़ से कोई थोड़ी निजात मिल जाये।

इसी उलझन में सोचते हुऐ बोली- मालिक, आपका अंडरवियर तेल लगने से खराब हो जायेगा। इसे भी उतार दें, वैसे भी हम दोनों के अलावा यहाँ तीसरा कौन है जो आपको इस हालत में देख लेगा। मैं बाहर जाकर किसी को भी बताऊँगी नहीं कि मैंने आपको पूरा नंगा देखा है।

उसने अपने मन की बात एक लहजे में आम बात की तरह कह दी।

उसकी बात सुनकर मालिक को तो जैसे हीरों का खज़ाना मिल गया हो, वो मन में सोचने लगा ‘साली मुझे मूर्ख बना रही है, खुद मेरे फेंके जाल में फंस गई है, खुद का दिल चुदवाने का हो रहा है। मेरे मन की बात खुद कह रही है। चलो जो भी है, कल को कोई बात बिगड़ी भी तो ये तो न कहेगी के आपने जोर ज़बरदस्ती से अपना लंड मेरे हाथ में दिया था।’

जमींदार- जब इतना कर दिया सुनीता, तो यह छोटा सा काम भी अपने कोमल हाथों से कर दे।
सुनीता मन में खुश होते हुए- जो हुक्म मालिक!

और सुनीता ने मालिक के अंडरवियर को दोनों हाथों से पकड़ कर टाँगों से बाहर निकल दिया। मालिक का मोटा लंड नए स्प्रिंग की तरह झटके खा रहा था, जिसे देखकर सुनीता की आंखें हैरानी से खुली की खुली रह गई और मुंह पर हाथ रखकर बोली- रे दइया इतना बड़ा… जैसे किसी घोड़े का काला लंड हो!

जमींदार- क्यों सुनीता, पसन्द आया मेरा हथियार?
‘हथियार’ शब्द सुनकर सुनीता के मुंह से हंसी निकल गई और बोली- आप भी न मालिक… क्या क्या नाम रखते हो?

मालिक के लंड मोटे पता नहीं ऐसी कौन सी शक्ति थी जो उसको अपनी ओर खींच रही थी, वो चाह कर भी खुद को रोक भी नहीं पा रही थी।
जमींदार- ऐसा करो सुनीता, अब इस पे भी गुनगुने तेल की मालिश कर दो।

मालिक का हुक्म पाते ही वो मालिक के लंड पे झपटी, पूरी ज़िन्दगी में आज पहली बार इतना लम्बा, मोटा लंड उसने अपने हाथ में लिया था जो उसके पति के लंड से तीन गुना मोटा और लम्बा था।
कितना ही चिर उसे टिकटिकी लगाकर देखती रही और बोली- मालिक, एक बात कहें यदि आप बुरा न मानें तो?
जमींदार- हाँ सुनीता बोल, क्या कहना चाहती है। खुल कर बोल, मैं बुरा नहीं मानूँगा।
सुनीता- हमारी मालिकन बहुत भाग्यशाली हैं।
जमींदार- वो कैसे?
सुनीता- उनके नसीब में इतना तगड़ा मोटा लंड जो है जो हर रात उसकी सेवा में हाज़िर होता है।

सुनीता की बात सुनकर मलिक की हंसी निकल गई और कहने लगा- हाँ सुनीता, ये तो है लेकिन अब पहले वाली बात तेरी मालकिन में रही नही। जब नई नई ब्याह कर आई थी तो खूब उछल उछल कर इस पे बैठ कर चुदती थी लेकिन धीरे धीरे उसका इसके प्रति प्यार घटता गया और रहती कसर मेरे बेटे ने पूरी कर दी।
सुनीता लंड के सुपाड़े पे तेल लगाते हुए- वो कैसे मालिक?
जमींदार- जब से वो पैदा हुआ है, उसकी माँ का मोह उसमें चला गया है। पहले जहाँ एक हफ्ते में हम 5 दिन चुदाई करते थे। अब वही महीने में एक बार, वो भी काफी तरले मिन्नतों के बाद करती है। इस लिए जब से तुम हमारे घर पे काम के लिए आई हो। तुम्हें देखकर अपनी कल्पना में रोजाना चोदता हूँ।

सुनीता उसकी कहानी सुनकर आज पहली बार मालिक सही और खुद को गलत महसूस कर रही थी। मालिक के मुख से ऐसी बात सुनकर सुनीता शर्मा गई और बोली- क्या मैं आपको इतनी सुंदर लगती हूँ जो आप मुझे अपनी कल्पना में रोज़ाना चोदते हो?
सुनीता का हाथ पकड़ कर अपने ऊपर खींचते हुए जमींदार बोले- और नहीं तो क्या… तुम क्या जानो तुम्हें लेकर मैंने कितने सपने संजोये हैं। बस एक बार मेरा यह काम कर दो, जो मांगोगी लेकर दूंगा।

मालिक की इस हरकत ने उसकी थोड़ी रहती शर्म भी निकाल दी, वो एक फार्मेल्टी वाली उपरले मन से बोली- छोड़ो मालिक, मैं ऐसी वैसी औरत नहीं हूँ। एक पतीव्रता स्त्री हूँ। कोई देख लेगा! छोड़ो भी न मालिक।
जमींदार- हट साली, पहले तो लंड को एक घण्टे से पकड़ कर हिला रही है, अब नाटक करती है।

जमींदार ने उसे अपने साथ लिटाकर उसके ऊपर खुद लेट गया। सुनीता ने खूब कोशिश की कि वो उसके शिकंजे से निकल जाये। परन्तु एक हट्टे कट्टे जमींदार की पकड़ से निकलना मुश्किल काम था।

सुनीता- मालिक, मुझे यह काम नहीं करना, मुझे घर जाने दो मेरा बेटा भूखा होगा, उसे जाकर दूध पिलाना है। जो भी काम रह गया कल आकर पूरा कर दूँगी। आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ, मुझे जाने दो।
लेकिन जमींदार कहाँ मानने वाला था, उसने इतनी मज़बूती से पकड़ा कि सुनीता की हिम्मत जवाब दे गई और उसने आत्म समर्पण कर दिया।
अब मालिक का लंड उसके पेट और जांघों पे चुभ रहा था।

जमींदार ने उसके होंठों से होंठ मिलाकर चूमना शुरू किया।
उसे मालिक का साथ देना पड़ा क्योंकि यदि वो विरोध करती तो मालिक न जाने कब तक उसके साथ धक्का करता रहता तो उसने साथ देने में ही भलाई समझी।
करीब 10 मिनट होंठों का रसपान करने से अब काम का नशा सुनीता पे चढ़ने लगा। वो आँखे बंद किए इस चढ़ रही खुमारी का आनन्द ले रही थी कि जमींदार ने उसे उठ कर कपड़े उतारने को कहा।

सुनीता ने वैसा ही किया।

सुनीता का गोरा चिट्टा बदन देखकर जमींदार की आँखें खुली की खुली रह गई। वो उसके उरोज़ों पे हाथ फेरता हुआ बोला- वाह! खुदा ने क्या बदन तराशा है। ऐसा बदन तो मेरी बीवी का भी नहीं है। काश सुनीता तू मेरी बीवी होती। मैं रोज़ इस संगमरमरी बदन का रसपान करता।
सुनीता- असल ज़िन्दगी में न सही मालिक, कुछ पल के लिए ही मान लो कि हम दोनों पति पत्नी हैं, कर लो अपने मन की… जो भी रीझ अधूरी है।

सुनीता की बात सुनकर जमींदार उसके उरोज़ों को मुंह में कर चूसने लगा जिनमें से थोड़ा थोड़ा मीठा दूध भी बहने लगा।
जमींदार- तुम्हारा दूध बहुत स्वदिष्ट है सुनीता… उम्म्ह… अहह… हय… याह… दिल चाहता है पीता ही जाऊँ।
सुनीता शरारती अंदाज़ में- नहीं मालिक, सारा दूध आप पी गए तो मेरा बेटा क्या पियेगा?
दोनो हंसने लगे और अपने काम में व्यस्त हो गए।

अब जमींदार सुनीता के ऊपर से उठा और खुद बेड पे लेट गया और सुनीता से बोला- सुनीता, तू ऊपर आ और अपने पसन्दीदा खिलौने को खुश कर… फिर ये तुझे खुश करेगा।
सुनीता हुक्म की पालना करती हुई नीचे से उठ कर उसकी टाँगो के बीच में आकर बैठ गई और तेल से सने लंड को मुट्ठी में भींच कर उसकी चमड़ी ऊपर नीचे करने लगी।

जमींदार- सुनीता इसे थोड़ा होंठों से भी प्यार कर… जितना इसे खुश करेगी, उससे दोगुनी ख़ुशी तुझे ये देगा।

सुनीता न चाहते हुए भी लंड की चमड़ी नीचे करके उसके गुलाबी सुपारे को अपनी जीभ से चाटने लगी। उसकी जीभ का स्पर्श पाते ही जमींदार जैसे सातवें आसमान की सैर करने लगा। वो आँखें बन्द किये इस सुनहरी पल का आनन्द ले रहा था।
इधर सुनीता भी एक माहिर वेश्या की तरह उसका लंड मुंह में लिए चूस रही थी।

अब 5-7 मिनट लंड चूसते रहने की वजह से सुनीता का मुंह दुखने लगा, ऊपर से उसके लंड की नसें फूलने की वजह से सुपारा भी फूल चूका था और उसके मुंह में घुसने में दिक्कत हो रही थी।

जमींदार- सुनीता, बस कर वरना तेरे मुंह में ही मेरा पूरा माल निकल जायेगा। तू ऐसे कर इस पर बैठ कर उठक बैठक कर। तब तक तेरे मुंह को थोड़ा आराम भी मिल जायेगा।

सुनीता को उसकी बात जंच गई और वो उठकर मालिक के थूक और तेल से सने लंड पे अपनी चूत सेट करके बैठ गई।
लंड के आकार के हिसाब से चूत का साइज़ बहुत छोटा था लेकिन फिर भी पता नहीं कैसे हिलने जुलने से आधे से ज्यादा लंड सुनीता की चूत ने निगल लिया था। अब वो ऊपर बैठी उठक बैठक कर रही थी जिस से उसके गोरे चिट्टे दूध से भरे उरोज़ हिल रहे थे।
कभी मालिक उनको पकड़ कर अपना सर ऊँचा करके बार बार उनका दूध पी रहा था तो कभी सुनीता की कमर पकड़ कर उसकी उठक बैठक करने में मदद कर रहा था।

काफी समय हिलने जुलने ने अब सुनीता थक कर चूर हो गई- मालिक, अब मुझसे और हिला नहीं जा रहा, आप ऊपर आ जाओ।

मालिक ने उसकी मज़बूरी देखते हुए लंड चूत में डाले ही बड़ी फुर्ती से सुनीता को अपने नीचे और खुद ऊपर आ गया। उसका यह अंदाज़ देखकर सुनीता हैरान रह गई और अपनी टाँगें जमींदार के कन्धों पे रख कर उनसे चुदवाने लगी।
अभी 10 मिनट ही हुए होंगे पोजिशन बदले को कि सुनीता बोली- मालिक और तेज़ करो, और तेज़ज्ज..

मालिक समझ गया कि इसका काम होने वाला है, उससे जितना भी ज़ोर लगा उस स्पीड से अपने हिलने की स्पीड बढ़ा दी. करीब 2 मिनट बाद एक लम्बी आह्ह्ह्ह्ह् ह्ह्ह लेकर सुनीता शांत हो गई लेकिन मालिक का अभी भी काम नहीं हुआ था, उसने अपना काम जारी रखा और थोड़े समय बाद ही वो भी उसके ऊपर ढेरी हो गया।

उसने अपने गर्म लावे से सुनीता की चूत भर दी। अब दोनों बेजान शरीरों की तरह एक दूसरे से सटे पड़े थे।
जब दोनों की सांसें कंट्रोल नहीं हुई तो एक दूसरे को देखकर हंसने लगे।

जमींदार- तो कहो कैसी लगी, मेरी अनोखी सज़ा तुझे?
सुनीता शरमाती हुई- यदि ऐसी सज़ा बार बार मिलेगी तो मैं बार बार वादा खिलाफी के लिए तैयार हूँ।
और एक ज़ोरदार हंसी से फिर एक दूसरे को लिपट गए।

उसके बाद एक बार फिर मालिक ने उसको अलग पोज़ में करीब चोदा। जिससे सुनीता के चेहरे पे सन्तुष्टि के भाव साफ दिखाई दे रहे थे।

उस दिन के बाद जब भी उनको चुदाई की भूख लगती, दूसरी हवेली पर पहुंच कर अपनी कामपिपासा शांत कर लेते।

करीब एक साल बाद सुनीता ने मालिक के एक बेटे को जन्म दिया। जिसका पूरा खर्च मालिक ने यह कह कर उठाया कि हमारे घर पे काम करती है, इसके लिये इतना तो कर ही सकते हैं।

और सजा का दौर ऐसे ही जारी रहा, जमींदार ने सुनीता का सारा कर्ज माफ़ कर दिया.

तो प्रिय दोस्तो, यह थी मेरी कामुक सेक्सी कहानी।
आपको कैसी लगी अपने विचार मुझे मेरी इमेल abhey275@gmail.com पर भेजने की कृपा करें।

Antervasna - Hindi Sex Stories | नई हिन्दी सेक्स कहानियाँ © 2018