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जब मस्ती चढ़ती है तो…-2

Jab Masti Chadhti Hai to- Part 2

प्रेषिका : बरखा

लेखक : राज कार्तिक

मेरी कहानी का पिछला भाग :- जब मस्ती चढ़ती है तो…-1

उसके बाद मेरे पति वापिस आ गए। आते ही मैंने उन्हें उलहाना दिया और अकेले छोड़ कर जाने के लिए थोड़ा सा झूठ-मूठ का झगड़ा भी किया। पर उस रात अजय ने पूरी रात असली लण्ड से मेरी चूत का पोर-पोर मसल दिया और मेरा सारा गुस्सा ठण्डा कर दिया। उस रात रजनी दूसरे कमरे में मेरे लकड़ी के मस्त कलन्दर के साथ मस्ती करती रही।

अगले दिन मेरे पति के जाने के बाद रजनी ने मेरे साथ एक बार फिर मस्ती की और मस्त कलन्दर को अपने साथ ले जाने के लिए पूछा। मैं देना तो नहीं चाहती थी पर जब रजनी बोली कि तुम्हारे ननदोई सा का अब सही से खड़ा नहीं हो रहा है और मुझे बैंगन खीरे से काम चलाना पड़ता है तो मैंने देने के लिए हाँ कर दी। उसी शाम को ननदोई सा आ गए रजनी को लेने और अगली सुबह वो रजनी को लेकर चले गए।

जिंदगी फिर से अपने पुराने रस्ते पर आ गई थी।

मुझे छोटी बच्ची को सँभालने और घर का काम करने में परेशानी हो रही थी और इस कारण अजय भी ड्यूटी के लिए लेट हो जाते थे कभी कभी। मैंने अजय को एक नौकर रखने के लिए कहा तो अजय ने जरुरत को ध्यान में रखते हुए हामी भर दी। पर एक समस्या थी की नौकर किसे रखें। बाहर के आदमी पर विश्वास करने का मन नहीं मान रहा था क्योंकि एक दो घटना मेरे शहर में हो चुकी थी और टी वी पर भी अक्सर ख़बरें आती रहती थी।

काफी सोच समझ कर फैसला किया कि मेरे पति के गाँव से किसी नौकर को शहर बुला लिया जाए। मेरे पति इस मकसद से गाँव में गए और जब अगले दिन वो वापिस आये तो एक बीस इक्कीस साल का नौजवान उनके साथ था।

मैं उसको जानती थी, यह राजकुमार था जिसको सभी प्यार से राजू कहते थे। वह मेरे पति के घर के पास ही रहता था और गाँव में मेरी ससुराल में ही घर का काम करता था।

मैं बहुत खुश हुई कि ठीक है, घर का ही एक आदमी मिल गया। हमने राजू को अपने घर के पीछे का एक कमरा रहने के लिए दे दिया। राजू ने आते ही घर का सारा काम संभाल लिया। अब मैं तो सिर्फ उसकी थोड़ी बहुत मदद कर देती थी नहीं तो सारा काम वो ही करता था। काम खत्म करने के बाद हम अक्सर गाँव की बातें करने लगते समय बिताने करने के लिए। पर सब कुछ मर्यादा में ही था।

जिंदगी चल रही थी पर जैसा मैंने बताया कि पता नहीं जिंदगी कब कौन सा रंग बदल ले।

कुछ दिन बाद होली का त्यौहार था और सभी जानते हैं कि कितना मस्ती भरा त्यौहार है यह। हमारे राजस्थान में तो होली पर बहुत मस्ती होती है।

होली वाले दिन सुबह जल्दी नाश्ता करके सब होली खेलने के लिए इकट्ठे हुए। मेरे पति के एक-दो दोस्त भी आये और मुझे रंग कर चले गए। कुछ देर बाद मेरे पति को भी उनके दोस्त अपने साथ ले गए। राजू आज सुबह से बाहर था। कुछ देर बाद जब आया तो वो पूरी मस्ती में था, आते ही बोला- भाभी…. अगर आप बुरा न मानो तो क्या मैं आपको रंग लगा सकता हूँ?

वो मुझे भाभी ही कहता था। वो मेरे ससुराल का था और मेरे देवर की तरह था तो मैं उसको हाँ कर दी। मेरा हाँ करना मुझे भारी पड़ गया क्योंकि मेरी हाँ सुनते ही राजू रंग लेकर कर मुझ पर टूट पड़ा और मुझे रंग लगाने लगा।

मैं कहती रही- आराम से ! आराम से !

पर राजू ने मेरे बदन पर रंग मल दिया।

रंग लगाते लगाते राजू के हाथ कई बार मेरी चूची और मेरी गाण्ड पर भी लगा जिसे मैंने तब महसूस नहीं किया पर जब वो रंग लगा कर हटा तो अपने कपड़ों की हालत देख कर मेरा मन बेचैन हो गया क्योंकि मेरी चूचियाँ पूरी रंग से सराबोर थी। मेरे पेट पर भी रंग लगा था और मेरी साड़ी भी अस्त-व्यस्त हो चुकी थी।

राजू के हाथ का एहसास अब भी मेरे बदन के ऊपर महसूस हो रहा था। उसने मेरी चूचियाँ कुछ ज्यादा जोर से मसल दी थी।

लगभग बारह बजे तक ऐसे ही मस्ती चलती रही। राजू ने भांग पी ली थी जिस कारण उस पर होली का नशा कुछ ज्यादा ही चढ़ा हुआ था और उसने कम से कम तीन-चार बार मुझे रंग लगाया। मैं मना करती रही पर वो नहीं माना।

करीब एक बजे मैंने राजू को नहा कर दोपहर का खाना तैयार करने के लिए कहा। मैं भी अब नहा कर अपना रंग छुड़वाने की तैयारी करने लगी।

कुछ देर बाद मैं नहा कर कपड़े बदल कर रसोई में गई तो देखा राजू अभी वहाँ नहीं आया था। मैं उसको बुलाने के लिए उसके कमरे की तरफ गई तो वो अपने कमरे के बाहर खुले में ही बैठ कर नहा रहा था।

मैंने आज पहली बार राजू का बदन देखा था। गाँव के दूध-घी का असर साफ़ नजर आ रहा था। राजू का बदन एकदम गठीला था। उसके पुट्ठे अलग से ही नज़र आते थे। होते भी क्यों ना ! गाँव के लोग मेहनत भी तो बहुत करते हैं तभी तो उनका बदन इतना गठीला होता है।

बदन तो अजय का भी अच्छा है पर शहर की आबो-हवा का असर नजर आने लगा है। पर ना जाने क्यों मुझे राजू का बदन बहुत आकर्षक लगा। कुछ देर मैं उसके बदन को देखती रही पर उसने शायद मुझे नहीं देखा था। तभी मैं उसको आवाज देते हुए उसके पास गई और थोड़ा सा डाँटते हुए बोली- तू नहाया नहीं अभी तक…? दोपहर का खाना नहीं बनाना है क्या?

“भाभी पता नहीं तुमने कैसा रंग लगाया है छूट ही नहीं रहा है… अगर बुरा ना मानो तो मेरी पीठ से रंग को साफ़ करने में मेरी मदद करो ना !”

मैं कुछ देर सोचती रही और फिर अपने आप को उसके बदन को छूने से नहीं रोक पाई और बोली- लया साबुन इयाँ दे… यो मेरो रंग है इया कौनी उतरेगो !

राजू मेरी बात सुन कर हँस पड़ा और मैं बिना कुछ कहे साबुन उठा कर राजू की पीठ पर लगाने लगी।अचानक साबुन फिसल कर नीचे गिर गया और जब मैं उसको उठाने के लिए झुकी तो मेरी नज़र राजू के कच्छे में बने तम्बू पर पड़ी। शायद मेरे स्पर्श से राजू का लण्ड रंगत में आ गया था और सर उठा कर कच्छे में खड़ा था। तम्बू को देख कर ही लग रहा था की अंदर बहुत भयंकर चीज होगी।

मेरे अंदर अब कीड़े रेंगने लगे थे। मैं राजू को जल्दी नहा कर आने का कह कर अंदर चली गई और अपने कमरे में जाकर अपनी चूत सहलाने लगी। मुझे अब अजय या मस्त कलंदर की बहुत जरुरत थी पर दोनों ही इस समय मेरे पास नहीं थे।

मन बहुत बेचैन हो रहा था कि तभी अजय की गाड़ी की आवाज आई।

ये रंग से सराबोर होकर वापिस आये थे। मैंने इन्हें नहाने के लिए कहा पर इन्होंने मुझे पकड़ कर मुझे फिर से रंग लगा दिया। कुछ देर की हँसी मजाक के बाद ये नहाने जाने लगे तो मैंने कहा- मेरा क्या होगा?

तो इन्होने मुझे पकड़ कर बाथरूम में खींच लिया।

मैं कहती रही कि बाहर राजू है पर इन्होंने मेरी एक ना सुनी। दिल तो मेरा भी बहुत कर रहा था सो मैं भी जाकर इनके पास खड़ी हो गई। हमने एक दूसरे के कपड़े उतारे और फ़व्वारे के नीचे खड़े होकर नहाने लगे।

नहाते नहाते जब बदन एक दूसरे से रगड़े तो चिंगारी निकली और मैं वही बाथरूम में चुद गई।

ऐसा नहीं था कि मैं बाथरूम में नहाते नहाते पहली बार चुदी थी पर आज राजू का लण्ड देख कर जो मस्ती चढ़ी थी उसमे चुदवाने से और भी ज्यादा मज़ा आया था या यूँ कहो कि आज जितना मज़ा पहले कभी अजय ने मुझे नहीं दिया था।

इस होली ने मेरी नियत खराब कर दी थी। अब मेरा बार बार दिल करता था राजू का लण्ड देखने को।अब मैं भी इस ताक में रहती कि कब राजू का लण्ड देखने को मिले। वो घर के पिछवाड़े में पेशाब करता था तो मैं अब हर वक्त नजर रखती कि कब वो पेशाब करने जायगा। जब वो पेशाब करते हुए अपना लण्ड बाहर निकालता और उसमे से मोटी मूत की धार निकलती मेरी चूत चुनमुना जाती। मेरे कमरे की खिड़की से पिछवाड़े का सारा नज़ारा दिखता था। मेरे कमरे की खिड़की के शीशे में से अंदर का नहीं दिखता था पर बाहर का सब कुछ नज़र आता था। राजू का लण्ड देखने के बाद रात को अजय से चुदवाते हुए भी राजू का लण्ड दिमाग में रहता और चुदाई में भी और ज्यादा मज़ा आता।

कहानी अभी बाकी है।

मेरी मेल आईडी – vr6215@gmail.com

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