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चूत उसके लगी है पर चूतिया तू है-2

Choot Uske Lagi Hai par Chutiya Tu Hai-2

आपने मेरी कहानी चूत उसके लगी है पर चूतिया तू है-1 पढ़ी अब आगे..

उसने बड़े शरारती अंदाज़ में मुझे देखा और बोली- आज घर में कोई है क्या?

मेरे तो होश ही उड़ गए…

तो क्या वो चीनी के बहाने मुझसे मिलने आई थी?!

मैंने कहा- नहीं, है तो कोई नहीं, पर थोड़ी देर में अब्बा आने वाले हैं।

‘तो अब्बा कितनी देर में आएँगे?’ उसने पूछा।

‘बस आधे घंटे तक आ जाएँगे।’ मैंने जवाब दिया।

‘आधा घंटा तो बहुत होता है।’ उसने कहा।

तो सच कहूँ मेरे तो पसीने छूट गए।

मतलब वो मुझसे चुदने आई है और मैं शराफत दिखा रहा हूँ।

मैंने मन में सोचा ‘साले चूत उसके लगी है पर चूतिया तू है।’

मैं आगे बढ़ा, तो वो जल्दी से चल कर दरवाजे के पास चली गई…

और बोली- अब परसों तलक सब्र करो…

यह कह कर उसने बड़ी प्यारी सी एक मुस्कान मेरी तरफ फेंकी और चली गई।

मैंने मन ही मन सोचा- शराफत का ज़माना नहीं है, जो मिलता है उसे गुपड़ लो, फिर पता नहीं मिले न मिले।

उसके बाद तो एक सेकंड भी मिलता तो मैं कभी उसे आँख मार रहा हूँ, कभी उसे फ्लाइंग किस भेज रहा हूँ और वो भी मुझे दबादब जवाब दे रही थी।

मतलब साफ था, के अबकी बार जब हम मिलेंगे तो धमाका होगा ही होगा।

अल्लाह अल्लाह करके परसों आई।

मैं अब्बा के जाते ही काम लेकर खिड़की में बैठ गया।

जब जमीला दिखी तो मैंने इशारे से उसे बुलाया।

उस वक़्त वो आँगन में झाड़ू लगा रही थी।

उसने दो मिनट रुकने का इशारा किया।

मैं झट से नीचे उतर आया और दरवाजे के पास ही खड़ा हो गया।

जब उसने आ कर घंटी बजाई तो मैं दरवाजा खोला, ‘सलाम…’ मैंने कहा।

तो उसने भी सलाम का जवाब दिया।

मैंने उसे अंदर बुलाया और उसके आने पर दरवाजा लगा लिया।

उसके हाथ में चीनी से भरी कटोरी थी।

मैंने उसकी आँखों में देखा, वो बोली- आपकी चीनी की कटोरी वापिस करने आई हूँ।

जब उसने कटोरी मेरी तरफ बढ़ाई तो मैंने कटोरी के साथ उसके हाथ भी पकड़ लिया।
उसने कुछ नहीं कहा, मैंने कुछ नहीं कहा।

मैंने कटोरी लेकर मेज पे रख दी मगर उसका हाथ नहीं छोड़ा।

हाथ को अपनी तरफ खींचा और खुद भी आगे बढ़ कर उसको गले से लगा लिया।

वो भी बिना कुछ कहे चुपचाप मुझसे लिपट गई।

मैं उसके गोल गुदाज मम्मे अपने सीने से लगे महसूस कर रहा था।

उसका पेट मेरे पेट से चिपक गया था, उसका सर मेरे कंधे पर था और मैं उसकी गरम साँसें अपने कंधे पर महसूस कर रहा था।

मैंने अपने दोनों हाथ उसकी पीठ पर फेरे।

उसने शर्ट के नीचे सिर्फ ब्रा पहनी थी।

मैंने उसकी ब्रा पे भी हाथ फेरा, फिर मैंने उसका सर ऊपर उठाया।

उसने मेरी आँखों में देखा, मैंने उसकी ठुड्डी अपने हाथ में पकड़ी और उसके होंठों पे अपना अंगूठा फेरा।

वो चुप थी।

मैं थोड़ा सा झुका और उसके होंठों पे अपने होंठ रख दिये।

जैसे ही हमारे होंठ मिले उसने अपना एक हाथ मेरे सर के पीछे लगा लिया और मुझे अपने से और भींच लिया।

मैं उसके होंठ चूस रहा था और मेरे मुँह में उसके पान का स्वाद आ रहा था।

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उसने अपनी जीभ निकाली और मेरे होंठ पे फेरी, मैंने भी वैसा ही किया और अपने हाथ भी लेजा कर उसके चूतड़ों पर रख दिये और उन्हें ज़ोर से दबाया।

कुछ देर चूसने ने बाद मैंने उसे गोद में उठाया और दीवान पे लेटा दिया।

आज शराफत उड़न छू हो चुकी थी।

मैंने उसका दुपट्टा खींच के अलग कर दिया।

पीले रंग के कसे हुये सूट में उसकी जोबन उभर उभर के बाहर आ रहा था।

मैं उसके बगल में लेट गया।

मैंने सबसे पहले उसके खूबसूरत मम्मों को अपने हाथ से सहलाया।

सूट गहरे गले का होने से उसका क्लीवेज भी दिखा रहा था, मैंने उसके क्लीवेज को चूमा और उसके मम्मों की दरार में जीभ डाल के चाटा, मेरे मुँह में उसके मम्मों पर लगे पाउडर का स्वाद आ गया।

मैंने फिर से उसके होंठों को चूमना चूसना शुरू कर दिया।

एक हाथ से मैं उसके मम्मे दबा रहा था, अपनी टांग से मैं उसकी जांघें सहला रहा था और घुटने को उसकी चूत पे रगड़ रहा था।

उसने भी अपना हाथ बढ़ाया और मेरा लौड़ा अपने हाथ में पकड़ लिया जो पहले ही पत्थर की तरह सख्त हो चुका था।

मैं उछल के उसके ऊपर आ गया, तो उसने भी अपनी टाँगें फैला दी।

मैं उसकी टाँगों के बीच में आ गया, अब मैं उसके दोनों मम्मे अपने हाथों में पकड़ के दबाने लगा, होंठ छोड़ अब तो जीभ से जीभ के सीधी लड़ाई थी और अपना लण्ड उसकी फ़ुद्दी पे घिसाने लगा।

वो भी मेरे नीचे लेटी तड़प रही थी, और मुझे ऐसे कस कस के बाहों में भींच रही थी कि जैसे मेरे को अपने अंदर ही घुसा लेना चाहती हो।

‘जमीला, अब और सब्र नहीं होता…’ यह कह कर मैं उठा और अपने कपड़े उतारने लगा।

कपड़े थे क्या एक टी शर्ट, और एक लोअर।
दोनों के उतारते मैं बिल्कुल नंगा हो गया और जमीला के सामने अपना लण्ड हिलाने लगा।

उसने भी बिना मेरे कहे, अपनी कमीज़ और सलवार उतार दी।

जब ब्रा खोलने लगी तो मैंने कहा- रुको जानेमन, ब्रा मैं खोलूँगा।

मैंने उसकी ब्रा खोली और उसके दोनों मम्मों को आज़ाद कर दिया।

मैंने दोनों को पकड़ा और मुँह में लेकर चूसा, काटा, खाया।

जमीला सिसकारियाँ ले रही थी और अपने हाथ से पकड़ के मेरा लाण्डिया सहला रही थी।

जब मैं उसके मम्मो से खेल चुका तो वो खुद ही नीचे बैठ और मेरा लौड़ा मुँह में लेकर चूसने लगी।

‘बड़ा प्यार कर रही हो अपने खसम को, वसीम भाई को भी ऐसे ही करती हो?’ मैंने पूछा।

‘अरे सब कर के देख लिए, तेरे वसीम भाई में तो इतनी तड़ ही नहीं है, उनका तो रबर का बना है और मुझे तो लोहा चाहिए, ऐसा !’ कह कर वो फिर से चूसने लगी।

पर अब मुझे चुसवाना नहीं था।

मैंने उसे उठा के फिर से दीवान पे लेटाया और खुद उसके ऊपर आ गया।

उसने भी अपनी टाँगें खोली, अपने हाथ में मेरा लण्ड पकड़ कर खुद अपनी चूत पर रखा, फिर दोनों हाथ मेरी कमर के आजू बाजू रखे और अपनी तरफ खींचा।

मैंने भी हल्के से कमर को आगे को धकेला और मेरा लण्ड धीरे से उसकी चूत के सुराख में घुस गया।

और करते मेरा सारा लण्ड अंदर समा गया।

जब पूरा अंदर तक चला गया तो मैंने उसके हाथों को बिल्कुल पीछे लेजा कर उँगलियों में उँगलियाँ फंसा ली तो उसने भी अपनी टाँगें मेरी टाँगों के गिर्द लपेट दी, होंठों से होंठ मिले और मैंने उसकी चूत में अपना लण्ड फेरना शुरू किया।

मैं ऊपर से ज़ोर लगा रहा था और वो नीचे से।

न वो कोई बात कर रही थी न ही मैं, हम दोनों इस लम्हे को भरपूर जी रहे थे।

5-7 मिनट ऐसे ही धीरे चुदाई होती रही।

फिर वो बोली- एक मिनट रुको।

मैं थोड़ा पीछे हुआ तो उसने मेरा लण्ड अपनी चूत से निकाल दिया और बोली- तुम नीचे आओ।

मैं नीचे लेट गया तो वो मेरे ऊपर आ गई, मेरा लण्ड पकड़ा और अपनी चूत पे सेट करके बैठ गई।

जब लण्ड पूरी तरह से अंदर घुस गया तो वो खुद उचक उचक कर चुदवाने लगी।

उसकी दोनों छातियाँ मेरे चेहरे पर झूल रही थी मैं कभी इसको तो कभी उसकी चूस रहा था।

‘चूसो मत… काट काट के खाओ इन्हें !’ वो जोश में बोली।

मैं देख कर हैरान था कि वो तो मुझे से भी ज़्यादा ज़ोर लगा रही थी।

मुझे ऐसे लग रहा था जैसे वो अपनी चूत से मेरा लण्ड चूस रही ही।

उसकी स्पीड बढ़ती गई, बढ़ती गई, और फिर एकदम से वो मेरे ऊपर ही गिर गई।

पसीने से भीगी मुझसे लिपट गई तो मैं समझ गया कि उसका काम तमाम हो गया है, मैं नीचे से थोड़ा थोड़ा लण्ड हिला रहा था ताकि उसको भी मज़ा आता रहे और मेरा भी मोशन बना रहे।

जब वो थोड़ी शांत हुई तो मैं फिर से ऊपर आ गया।

वो बोली- सुनो, जैसे मैंने किया न, ज़ोर से वैसे करना, तुम्हारा आराम आराम से करना मुझे अच्छा नहीं लगता, मुझे जोरदार चुदाई पसंद है।

अब उसका तो हो चुका था, मेरा होना था, तो मुझे कौन सा जल्दी झड़ने का डर था, मैं तो अपनी पूरी ताक़त झोंक दी।

ताबड़तोड़ चुदाई की उसकी।

दो मिनट भी नहीं लगे कि मेरा भी काम फतेह होने वाला हो गया।

मैंने पूछा- कहाँ छुड़वाऊँ?

वो बोली- अंदर ही चलने दे…

बस इतना कहने की देर थी और मैंने अपने रस से उसकी चूत को भर दिया।

मैं भी कटे पेड़ की तरह उस पर गिर गया।

कुछ देर लेटने के बाद वो बोली- अब जाऊँ?

मैंने कहा- नहीं, अभी एक बार और करना है।

वो बोली- सच कहूँ, मेरे अपने दिल में यही बात थी, अगर तुम जाने को कहते तो मुझे बुरा लगता।

मैंने कहा- तो चलो ऊपर मेरे कमरे में चल के करते हैं।

वो झट से तैयार हो गई और मैं उसे उसी तरह नंगी हालत में ही अपने ऊपर वाले कमरे में ले गया।
जहाँ हमने एक बार फिर से जवानी का खेल खेला।
alberto62lopez@yahoo.in

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