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आंटी गुलबदन और सेक्स (प्रेम) के सात सबक-4

Aunty Gulbadan Aur Sex (Prem) Ke Sath Sabak- Part 4

प्रेम गुरु की कलम से

आपने मेरी कहानी पढ़ी -: आंटी गुलबदन और सेक्स (प्रेम) के सात सबक-3

6. सम्भोग (प्रेम मिलन)

काम विज्ञान के अनुसार सम्भोग का अर्थ होता है समान रूप से भोग अर्थात स्त्री और पुरुष दोनों सक्रिय होकर सामान रूप से एक दूसरे का भोग करें। नियमित रूप से सुखद सम्भोग करने से बुढ़ापा जल्दी नहीं आता और स्त्रियों में रजोनिवृति देरी से होती है और हड्डियों बीमारियाँ भी नहीं होती। दाम्पत्य जीवन में मधुर मिलन की पहली रात को सुहागरात कहते हैं। इस रात के मिलन की अनेक रंगीन व मधुर कल्पनाएँ दोनों के मन में होती है। और आज तो जैसे हमारा मधुर मिलन ही था। आंटी ने बताया था कि आज की रात हमारे ख़्वाबों की रात होगी जैसे तुम किसी परी कथा के राज कुमार होगे और मैं तुम्हारे ख़्वाबों की शहजादी। मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे आज की रात दीवानों की तरह प्रेम करो। मैं तुम्हारे आगोश में आकर सब कुछ भूल जाना चाहती हूँ मेरे प्रियतम। ये चांदनी तो तुम्हारे प्रेम के बिना मर ही जायेगी। आंटी ने बताया था कि इस संगम को हम चुदाई जैसे गंदे नाम से कदापि नहीं बोलेंगे हम इसे अपना मधुर मिलन ही कहेंगे। अब मैं यह सोच रहा था कि इसे सुहागरात कहो या प्रेम मिलन होनी तो चूत की चुदाई ही है, क्या फर्क पड़ता है।

आज तो घूँघट उठाना था। अरे बाबा सिर का नहीं चूत का। मैं तो चाहता था कि बस जाते ही उन्हें दबोच कर अपना मिट्ठू उनकी मुनिया में डाल ही दूं। पर आंटी ने बताया था कि सम्भोग मात्र शरीर व्यापार नहीं है। स्त्री पुरुष के सच्चे यौन संबंधों का अर्थ मात्र दो शरीरों का मिलन ही नहीं दो आत्माओं का भावनात्मक प्रेम और लगाव भी अति आवश्यक होता है।

मैंने आज सिल्क का कामदार कुरता और चूड़ीदार पाजामा पहना था। आंटी तो पूरी दुल्हन ही बनी पलंग पर बैठी थी। सुर्ख लाल जोड़े में वो किसी नवविवाहिता से कम नहीं लग रही थी। कलाइयों में 9-9 चूड़ियाँ , होंठों पर लिपस्टिक, हाथों में मेहंदी, बालों में गज़रा। पूरे कमरे में गुलाब के इत्र की भीनी भीनी महक और मध्यम संगीत। पलंग के पास रखी स्टूल पर थर्मोस में गर्म दूध, दो ग्लास , प्लेट में मिठाई और पान की गिलोरियां रखे थे। पलंग पर गुलाब और चमेली के फूलों की पत्तियाँ बिखरी थी। 3-4 तकिये और उनके पास 2 धुले हुए तौलिये। क्रीम और तेल की शीशी आदि। मुझे तो लगा जैसे सचमुच मेरी शादी ही हो गई है और मेरी दुल्हन सुहाग-सेज पर मेरा इन्तजार कर रही है। उन्होंने बताया था कि सुहागरात में चुदाई पूरी तसल्ली के साथ करनी चाहिए। कोई जल्दबाजी नहीं। यह मधुर मिलन है इसे ऐसे मनाओ जैसे कि जैसे ये नए जीवन की पहली और अंतिम रात है। हर पल को अनमोल समझ कर जीओ। जैसे इस प्रेम मिलन के बाद कोई और हसरत या ख़्वाहिश ही बाकी ना रहे।

कुछ मूर्ख तो सुहागरात में इसी फिक्र में मरे जाते हैं कि पत्नी की योनि से खून निकला या नहीं। यदि रक्तस्त्राव नहीं हुआ तो यही सोचते हैं कि लड़की कुंवारी नहीं है जरूर पहले से चुदी होगी। जबकि लड़की के कौमार्य का यह कोई पैमाना नहीं है। लड़की का योनिपटल एक पतली झिल्ली की तरह होता है जो योनि को बेक्टीरिया और हानिकारक रोगाणुओं से बचाता है। कई बार खेल के दौरान, साइकिल चलाने, घुड़सवारी या तैराकी आदि से यह टूट जाता है इसका अर्थ यह नहीं है कि लड़की ने अपना कौमार्य खो दिया है।

मैं उनके पास आकर बैठ गया। उन्होंने चुनरी का पल्लू थोड़ा सा नीचे कर रखा था। मैंने आज की रात आंटी को देने के लिए एक हल्का सा सोने का लोकेट खरीदा था। मैंने यह लोकेट अपने साल भर के बचा कर रखे जेब खर्च से खरीदा था। मैंने अपने कुरते की जेब से उसे निकाला और आंटी के गले में पहनाने के लिए अपने हाथ बढ़ाते हुए कहा,”मेरी चांदनी के लिए !”

आंटी ने अपनी झुकी पलकें ऊपर उठाई। उफ … क्या दमकता रूप था। आज तो आंटी किसी गुलबदन और अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। नाक में नथ, कानों में सोने की छोटी छोटी बालियाँ, आँखों में काजल, थरथराते लाल गुलाबी होंठ। उन्होंने अपना सिर थोड़ा सा ऊपर उठाया और अपनी बंद पलकें खोली। मैंने देखा उनकी आँखें सुर्ख हो रही हैं जैसे नशे में पुरख़ुमार हों। लगता है वो कल रात जैसे सोई ही नहीं थी। मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी कि वो आज चुप क्यों हैं। उनकी आँखें तो जैसे डबडबा रही थी। होंठ कांप रहे थे वो तो जैसे बोल ही नहीं पा रही थी। उसने अपनी आँखें फिर बंद कर ली।

मैंने उसके गले में वो लोकेट पहना दिया तब उन्होंने थरथराती सी आवाज में कहा,”धन्यवाद ! मेरे प्रेम ! मेरे काम देव !”

उसकी आँखों से आंसू निकल कर उसके गालों पर लुढ़क आये। मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसने अपना सिर मेरे सीने से लगा दिया। मैं उसके सिर और पीठ पर पर हाथ फिराता रहा। फिर मैंने उसके आंसू पोंछते हुए पूछा,” क्या हुआ ?”

“कुछ नहीं यह तो प्रेम और ख़ुशी के आंसू हैं।”

शायद उन्हें अपनी पहली सुहागरात याद हो आई थी। ओह… मैं तो आज क्या क्या रंगीन सपने लेकर आया था। यहाँ तो सारा मामला ही उलटा हो रहा था। पर इससे पहले कि मैं कुछ करूँ आंटी ने अपने सिर को एक झटका सा दिया और मेरा सिर अपने हाथों में पकड़ कर अपने कांपते होंठ मेरे जलते होंठों पर रख कर चूमने लगी। वो साथ साथ बड़बड़ाती भी जा रही थी,” ओह… मेरे प्रेम ! मेरे कामदेव ! मेरे चंदू मुझे आज इतना प्रेम करो कि मैं तुम्हारे प्रेम के अलावा सब कुछ भूल जाऊं !” और तड़ातड़ा कई चुम्बन उसने मेरे गालों और होंठों पर ले लिए।

“हाँ हाँ मेरी चांदनी… आज की रात तो हमारे प्रेम मिलन की रात है मेरी प्रियतमा !” मैंने कस कर उसे अपनी बाहों में भर लिया। पता नहीं कितनी देर हम इसी तरह एक दूसरे को चूमते रहे। मैं पलंग पर टेक सी लगा कर बैठ गया और आंटी मेरी गोद में सिर रख कर लेट गई। उसकी आँखें बंद थीं और मैं उसके चेहरे पर अपने हाथ फिरा रहा था, कभी गालों पर, कभी होंठों पर कभी माथे पर।

“चांदनी आज तो हमारा प्रेम मिलन है और आज तुम रो रही हो ?”

“हाँ चंदू ! आज मुझे अपना पहला प्रेम याद आ गया था। मैं कल सारी रात उसे याद करके रोती रही थी। तुम नहीं जानते मैंने अपने दूसरे पति को भी कितना चाहा था पर उसे तो पता नहीं उस दो टके की छोकरी में ऐसा क्या नज़र आया था कि उसके अलावा वो सब कुछ ही भूल गया।”

उसने आगे बताया था कि उनकी पहली शादी चार साल के लम्बे प्रेम के बाद 25 साल की उम्र में हुई थी। एक साल कब बीत गया पता ही नहीं चला। पर होनी को कौन टाल सकता है। एक सड़क दुर्घटना में उनके पहले पति की मौत हो गई। घर वालों के जोर देने पर दूसरी शादी कर ली। उस समय उसकी उम्र कोई 28-29 साल रही होगी। नीरज भी लगभग 32-33 का रहा होगा पर मैंने कभी पूछा ना कभी इस मसले पर बात हुई थी। पर बाद में मुझे लगा कि कहीं ना कहीं उसके मन में एक हीन भावना पनप गई थी कि उन्हें एक पहले से चुदी हुई पत्नी मिली है। उसने कहीं पढ़ा था कि अगर कोई बड़ी उम्र का आदमी किसी कमसिन और कुंवारी लड़की के साथ और कोई बड़ी उम्र की औरत किसी किशोर लड़के के साथ सम्भोग करे तो उसके सेक्स की क्षमता दुगनी हो जाती है। ये तो निरा पागलपन और बकवास है। वैसे ये जो मर्दजात है सभी एक जैसी होती है। मुझे बाद में पता लगा उनका अपनी सेक्रेट्री के साथ भी सम्बन्ध था जो उम्र में लगभग उनसे आधी थी। पता नहीं इन छोटी और अनुभवहीन लौंडियों के पीछे ये सारे मर्द क्यों मरे जाते हैं। जो मज़ा और आनंद एक जानकार और अनुभवी स्त्री से मिल सकता है भला उन अदना सी लड़कियों में कहाँ ? पर इन मर्दों को कौन समझाए ? ओह….. चंदू… छोडो इन फजूल बातों को। आज हमारी सुहागरात है इस का मज़ा लो। आंटी ने अपने आंसू पोंछ लिए।

“चांदनी… मेरी चंदा ! मेरी प्रियतमा ! अब छोड़ो उन बातों को। क्यों ना हम फिर से नया जीवन शुरू करें ?”

“क्या मतलब ?”

“क्यों ना हम शादी कर लें ?”

“ओह… नहीं मेरे प्रेम यह नहीं हो सकता ? मैं नहीं चाहती कि तुम भी थोड़े सालों के बाद ऐसा ही करो। बस इन संबंधों को एक ट्रेनिंग ही समझो और बाकी बातें भूल जाओ !”

“क्यों ? ऐसा क्यों नहीं हो सकता ?”

“तुम अभी बहुत छोटे हो इन बातों को नहीं समझोगे। हम इस मसले पर बाद में बात करेंगे। आज तो बस तुम मुझे प्रेम करो ! बस” और उसने अपनी बाहें ऊपर कर मेरे गले में डाल दीं।

मैंने उसे फिर से अपनी बाहों में जकड़ लिया और फिर उसके होंठों को चूमने लगा। उसने अपनी जीभ मेरे मुंह डाल दी। किसी रस भरी कुल्फी की तरह मैंने उसे चूसने लगा। मेरा मिट्ठू तो लोहे की रॉड ही बना था जैसे। उसका तनाव तो इतना ज्यादा था कि मुझे लगने लगा था कि अगर जल्दी ही कुछ नहीं किया तो इसका सुपाड़ा तो आज फट ही जाएगा। चुम्बन के साथ साथ मैं अब उसके उरोजों को दबाने लगा। उसकी साँसें तेज होने लगी तो उसने मुझे कपड़े उतारने का इशारा किया। मैं जल्दी से अपने कपड़े उतारने लगा तो वो हँसते हुए बोली,” अरे बुद्धू अपने नहीं एक एक करके पहले मेरे उतारो !”

मेरे तो हंसी ही निकल गई। मैं तो उनका पूरा आज्ञाकारी बना था। मैंने पहले उसकी चुनरी फिर ब्लाउज और फिर धीरे से उनका घाघरा उतार दिया। अब वो केवल ब्रा और पैंटी में थी। संगेमरमर सा तराशा सफ्फाक बदन अब ठीक मेरे सामने था। ऐसे ही बदन वाली औरतों को गुलबदन कहा जाता है आज मैंने पहली बार महसूस किया था। अब मैंने भी अपने कपड़े उतार दिए। केवल एक चड्डी के सिवा मेरे शरीर पर कुछ भी नहीं था। और फिर उछल कर उन्हें अपनी बाहों में भर लिया। वो एक ओर लुढ़क गई। मैं ठीक उसके ऊपर था। मैंने उसे कस कर अपनी बाहों में भर लिया। आंटी ने भी मुझे चूमना शुरू कर दिया। अब मैं एक हाथ से उसके उरोजों को ब्रा के ऊपर से ही मसलना चालू कर दिया और दूसरे हाथ से उसकी मुनिया को पैंटी के ऊपर से ही अपने हाथ में पकड़ लिया। मेरा शेर तो जैसे दहाड़ें ही मारने लगा था।

आंटी एक झटके से उठ बैठी और उसने मेरी चड्डी निकाल फेंकी। मैं चित्त लेटा था। अब तो मिट्ठू महाराज उसे सलाम ही बजाने लगे। आंटी ने अपनी नाज़ुक अँगुलियों के बीच उसे दबा लिया। उसके ऊपर प्री-कम की बूँद चमक रही थी। उसने एक चुम्बन उस पर ले लिया। प्री-कम उसके होंठों पर फ़ैल गया। मैं तो सोच रहा था की वो उसे गच्च से अपने मुंह में भर लेगी। पर उसने कोई जदबाजी नहीं दिखाई। मिट्ठू तो झटके पर झटके खा रहा था। उसने साइड में पड़ी स्टूल पर रखी तेल की शीशी उठाई और मेरे मिट्ठू को जैसे नहला ही दिया। अब एक हाथ से मेरे अंडकोष पकड़ लिए और दूसरे हाथ से मिट्ठू को नाच नचाने लगी। मैं तो आ … उन्ह … ओईईइ … करता मीठी सित्कारें मारने लगा। आंटी तेजी से हाथ चलाने लगी। मुझे लगा इस तरह तो मैं झड़ ही जाऊँगा। मैंने उसे रोकना चाहा पर उसने मुझे इशारे से मन कर दिया और मेरे अंडकोष जल्दी जल्दी हाथ से मसलते हुए लंड को ऊपर नीचे करने लगी। मैं जोर से उछला और उसके साथ ही मेरी पिचकारी फूट गई। सारा वीर्य उसके हाथों और जाँघों और मेरे पेट पर फ़ैल गया।

मुझे अपने आप पर बड़ी शर्म सी आई। इतनी जल्दी तो मैं पहले कभी नहीं झड़ा था। आज पता नहीं क्या हुआ था कि मैं तो 2 मिनट में ही खलास हो गया। मुझे मायूस देख कर वो बोली,” चिंता करने की कोई बात नहीं है। मैं जानती थी तुम पहली बार में जल्दी झड़ जाओगे। इस लिए यह करना जरुरी था। अब देखना, तुम बड़ी देर तक अपने आप को रोक पाओगे। मैं नहीं चाहती थी कि हमारे प्रथम मिलन में तुम जल्दी झड़ जाओ और ठीक से मज़ा ना ले पाओ !”

“पर मैंने तो सुना है कि लोग आधे घंटे तक चुदाई करते रहते हैं और वो नहीं झड़ते ?”

“पता नहीं तुमने कहाँ कहाँ से यह सब गलत बातें सुन रखी हैं। सच्चाई तो यह है कि योनि में लिंग प्रवेश करने के बाद बिना रुके सेक्स करने पर स्खलन का औसत समय 3 से 10 मिनट का ही होता है। यह अलग बात है कि लोग कई बार सेक्स के दौरान अपने घर्षण और धक्कों को विराम दे कर स्खलन का समय बढ़ा लेते हैं !”

“वैसे कुछ लोग दूसरे टोटके भी आजमाते हैं ;

मूली के बीजों को या कबूतर की बीट को तेल में पका कर उस तेल से अपने लिंग पर मालिश की जाए तो इस से स्तम्भन शक्ति बढ़ती है। अगर सम्भोग करते समय निरोध लगा लिया जाए या अपने लिंग पर रबर का छल्ला पहन लिया जाए तो भी वीर्य देरी से स्खलित होता है। प्याज (ओनियन) का रस और शहद मिलाकर रोज़ खाने से पुरुष शक्ति बढती है। काले चने खाने और उरद की दाल खाने से घोड़े जैसी ताकत मिलती है और वीर्य गाढ़ा होता है। महुवे, सतावर, अश्वगंधा और चमेली के फूलों का सेवेन करने से वीर्य में वृद्धि होती है।”

मैंने बाथरूम में जाकर अपने मिट्ठू, पेट, जाँघों और हाथों को अच्छी तरह धोये और जब बाहर आया तो आंटी दूध भरा गिलास लिए मेरा इंतज़ार ही कर रही थी। जब तक मैंने केशर बादाम मिला गर्म दूध पीया वो बाथरूम से अपने हाथ साफ़ करके बाहर आ गई। बड़ी अदा से अपने कुल्हे और नितम्ब मटकाती वो पलंग के पास आकर खड़ी हो गई। उसका गदराया बदन देख कर तो मेरा शेर फिर से कुनमुनाने लगा था।

मैंने उठ खड़ा हुआ और उसे अपनी बाहों में भर कर चूम लिया। वो तो जैसे कब की तरस रही थी। उसने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। मैंने उसे पलंग पर चित्त लेटा दिया और उसके ऊपर आ गया। मैंने उसके गालों, होंठों, पलकों, गले और उरोजों की घाटियों पर चुम्बनों की झड़ी ही लगा दी। वो भी मुझे चूमे ही जा रही थी। मैंने उसकी पीठ सहलानी चालू कर दी अचानक मेरा हाथ उसकी ब्रा की डोरी से टकराया। मैंने उसे खींच दिया। दोनों कबूतर जैसे आजाद हो गए। आह… मोटे मोटे गोल कंधारी अनार हों जैसे। एरोला लाल रंग का और चूचक तो बस मूंगफली के दाने जितने गुलाबी रंग के। मैंने झट से एक अमृत कलश को अपने मुंह में भर लिया। आंटी ने मेरा सिर पकड़ लिया और एक मीठी सीत्कार लेकर बोली “चंदू इसे धीरे धीरे चूसो। चूचक को कभी कभी दांतों से दबाते रहो पर काटना नहीं …आह …”

“देखो सम्भोग से पहले पूर्व काम क्रीड़ा का बहुत महत्व होता है। प्रेम को स्थिर रखने के लिए सदैव सम्भोग से पहले पूर्व रति क्रीड़ा बहुत जरुरी होती है। पुरुष की उत्तेजना दूध के उफान या ज्वालामुखी की तरह होती है जो एक दम से भड़कती है और फिर ठंडी पड़ जाती है। परंतू स्त्री की उत्तेजना धीरे धीरे बढती है जैसे चाँद धीरे धीरे अपनी पूर्णता की ओर बढ़ता है लेकिन उनकी उत्तेजना का आवेग और समय ज्यादा होता है और फिर वो उत्तेजना धीरे धीरे ही कम होती है। इसके अलावा महिलाओं में उत्तेजना को प्राप्त करनेवाले अंग पुरुषों कि अपेक्षा ज्यादा होते हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार महिलाओं की मदनमणि (भागनासा) में जितनी ज्यादा संख्या संवेदन शील ग्रंथियों की होती है उतनी पुरुषों के लिंग के सुपाड़े में होती हैं। इसी लिए पुरुष जल्दी चरमोत्कर्ष पर पहुँच जाते हैं। तुम्हें शायद पता नहीं होगा कि पूर्णिमा के दिन समुद्र का ज्वार सब से ज्यादा ऊंचा होता है। यही स्थिति स्त्री की होती है। चंद्रमा के घटने बढ़ने के साथ साथ ही स्त्री का काम ज्वर घटता बढ़ता रहता है उसके ऋतुचक्र में कुछ दिन ऐसे आते हैं जब उसके मन में सम्भोग की तीव्र इच्छा होती है। माहवारी के कुछ दिन पहले और माहवारी ख़तम होने के 3-4 दिन बाद स्त्री का कामवेग अपने उठान पर होता है। बाद में तो यह चन्द्र कला की तरह घटता बढ़ता रहता है। इसलिए हर स्त्री को अलग अलग दिन अलग अलग अंगों को छूना दबाना और चूमना अच्छा लगता है।”

एक और बात सुनो,” सम्भोग करने से पहले अपनी प्रेयसी को गर्म किया जाता है। उसके सारे अंगों को सहलाया और चूमा चाटा जाता है कोई जल्दबाजी नहीं, आराम से धीरे धीरे। पहले सम्भोग में पुरुष उत्तेजना के कारण जल्दी झड़ जाता है और सम्भोग का पूरा आनंद नहीं ले पाता इसलिए अगर सुहागरात को पहले दिन में एक बार मुट्ठ मार ली जाए तो अच्छा रहता है। मैंने इसी लिए तुम्हारा पानी एक बार पहले निकाल दिया था। एक और बात यदि सम्भोग करते समय लिंग पर निरोध (कंडोम) लगा लिया जाए तो वीर्य जल्दी नहीं स्खलित होता और अनचाहे गर्भ से भी बचा जा सकता है।”

अब मैंने उसे अपनी बाहों में जोर से भर कर उन अमृत कलशों को जोर जोर से चूसना चालू कर दिया। आंटी की तो सीत्कार पर सीत्कार निकल रही थी। बारी बारी दोनों उरोजों को चूस कर अब मैंने उनकी घाटियाँ और पेट को भी चूमना चालू कर दिया। अब मैंने उसकी नाभि और पेट को खूब अच्छी तरह से चाटा। नाभि के गोलाकार 1 इंच छेद में अपनी जीभ को डाल कर घुमाते हुए मैंने उसकी पैंटी के ऊपर से ही हाथ फिराना शुरू कर दिया और अपने हाथों को उसकी जाँघों के बीच ले जा कर उसकी चूत को अपनी मुट्ठी में भर कर मसलने लगा। उसकी चूत एक दम गीली हो गई थी इसका अहसास मुझे पैंटी के ऊपर से भी हो रहा था। मैंने उसकी मक्खन सी मुलायम जाँघों को भी खूब चाटा और चूमा। जब मैं हाथ बढ़ा कर उनकी पैंटी हटाने लगा तो आंटी ने अपनी पैंटी की डोरी खुद ही खोल दी।

हालांकि आंटी की मुनिया मैं पहले देख चुका था पर आज तो इसका रंग रूप और नज़ारा देखने लायक था। गुलाबी रंग के फांकें तो जैसे सूज कर मोटी मोटी हो गई थी। चूत की फांकें और बीच की लकीर कामरस से सराबोर हो रही थी। मदनमणि तो किसी किसमिस के फूले दाने जितनी बड़ी लग रही थी। मैंने एक चुम्बन उस पर ले लिया। आंटी की तो एक किलकारी ही निकल गई। फिर वो बोली,”ओह … चंदू जल्दबाजी नहीं, ठहरो !”

उन्होंने अपनी दोनों टाँगे चौड़ी कर के फैला कर अपना खज़ाना ही जैसे खोल दिया। मैं उसकी टांगो के बीच में आ गया। उसने अपनी चूत की फांकों पर लगी सोने की बालियों को दोनों हाथों से पकड़ कर चौड़ा किया और मुझे बोली,” हाँ, अब इसे प्यार करो !”

मैं इस प्यार का मतलब अच्छी तरह जानता था। उसकी मोटी केले के तने जैसी मांसल और गोरी जाँघों के बीच गुलाबी चूत चाँद के जैसे झाँक रही थी। उसकी चूत के गुलाबी होंठ गीले थे और ट्यूब लाईट की दुधिया रौशनी में चमक रहे थे। उसकी जाँघों को हलके से दांत से काटते हुए मैं जीभ से चाटने लगा। मैं चूत के चाटते हुए अपनी जीभ को घुमा भी रहा था। उसका नमकीन और कसैला स्वाद मुझे पागल बना रहा था। मैं तो धड़कते दिल से उस शहद की कटोरी को चूसे ही चला गया। मेरा शेर फिर दहाड़ें मारने लगा था। आंटी की सीत्कार पूरे कमरे में गूंजने लगी थी “उईईइ।.. बहुत अच्छे, बहुत खूब, ऐसे ही, ओह…. सीईईईईईइ….. ओह मैं तुम्हें पूरा गुरु बना दूंगी आज। ओह … ऐसे ही चूसते रहो…. ओईईइ ….”

मैंने अब उसके मदनमणि के दाने को अपनी जीभ से टटोला। मैंने उसे जीभ से सहलाया और फिर एक दो बार दांतों के बीच लेकर दबा दिया। आंटी तो अपने पैर ही पटकने लगी। उसने अपनी जांघें मेरी गर्दन के गिर्द लपेट ली और मेरा सिर पकड़ कर अपनी जाँघों की ओर दबा सा दिया। मैं तो मस्त हुआ उसे चाटता और चूसते ही चला गया। थोड़ी देर बाद उसने अपने पैर नीचे कर लिए और अपनी जाँघों की जकड़न थोड़ी सी ढीली कर दी। अब मैंने भी अपनी जीभ से उसकी चूत को ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर फिराया। उसकी सोने की बालियाँ मुंह में लेकर होले से चूसा। फिर उन बालियों को दोनों हाथों से पकड़ कर चौड़ा किया और अपनी जीभ को नुकीला करके उसके गुलाबी छेद पर लगा कर होले होले अन्दर बाहर करने लगा। उसने एक जोर की सीत्कार की और मुझे कुछ नमकीन सा पानी जीभ पर फिर महसूस हुआ। शायद उसकी मुनिया ने कामरस फिर छोड़ दिया था।

जब मैंने अपना सिर ऊपर उठाया और फिर से उसके उरोजों की ओर आने लगा तो उसने मेरा सिर पकड़ लिया और मेरे होंठों को चूम लिया। मेरे होंठों पर लगे उसका कामरस का स्वाद उसे भी मिल ही गया होगा। अब उसने अपना हाथ बढ़ा कर मेरे मिट्ठू को पकड़ लिया। मिट्ठू तो बेचारा कब का इंतज़ार कर रहा था। उसने उसकी गर्दन पकड़ ली और उसे मसलना चालू कर दिया। उसने पास पड़ी क्रीम मेरे मिट्ठू पर लगा दी। मैंने भी उनकी चूत पर अपना थूक लगा दिया। और फिर एक अंगुली से उनकी चूत का छेद टटोला। ओह कितना मस्त कसा हुआ छेद था। अब देरी की कहाँ गुन्जाइस थी। मैंने अपने मिट्ठू को उनकी चूत के नरम नाजुक छेद पर लगा दिया। मैं उसके ऊपर ही तो था। मैंने अपना एक हाथ उसकी गर्दन के नीचे लगा लिया और दूसरा हाथ उसकी कमर के नीचे। उसने अपनी जांघें चौड़ी कर ली। और फिर मैं एक धक्का जोर से लगा दिया। मेरा मिट्ठू तो एक ही धक्के में अन्दर चला गया। आह… क्या नर्म और गुदाज अहसास था। मिट्ठू तो मस्त ही हो गया। मैंने दो तीन धक्के तेजी से लगा दिए। आंटी तो बस उईई।… मा… करती ही रह गई।

मुझे लगा जैसे मुझे कुछ जलन सी हो रही है। मैंने सोच शायद पहली बार किसी को चोद रहा हूँ इस लिए ऐसा हो रहा है पर यह तो मुझे बाद में पता चला था कि मेरे लिंग के नीचे का धागा टूट गया है और मेरे लंड का कुंवारापन जाता रहा है।

मैंने धक्के चालू रखे। उसे चूमना और उरोजों को मसलना भी जारी रखा। अब चूत पूरी रवां हो चुकी थी। आंटी बोली “नहीं चंदू ऐसे जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। चलो मेरी मुनिया ने तो पता नहीं कितनी बार अन्दर लिया होगा और तुम्हारा भी ले लिया पर अगर कोई कुंवारी लड़की हो तो इतनी जोर से धक्का लगाने से उसकी तो हालत ही ख़राब हो जायेगी। कभी भी पहला धक्का जोर का नहीं, बिल्कुल धीरे धीरे प्यार से लगाना चाहिए।”

मैंने अपनी मुंडी हिला दी। अब मैंने उनके होंठ चूमने शुरू कर दिए। उनके उरोज मेरी छाती से लग कर दब रहे थे उनके कड़े हो चले चुचूकों का आभास तो मुझे तरंगित ही कर रहा था। मैं कभी उनके होंठ चूमता कभी कपोलों को। अब आंटी ने अपने पैर ऊपर उठा दिए। आह… अब तो मज़ा ही ओर था। मुझे लगा जैसे किसी ने अन्दर से मेरा लंड कस लिया है और जैसे कोई दूध दुह रहा है। अनुभवी औरतें जब अपनी चूत को अन्दर से इस तरह सिकोड़ती हैं तो ऐसा कसाव अनुभव होता है जैसे कोई 16 साल की कमसिन चूत हो। मैंने अपने धक्के चालू रखे। उसने अपने पैरों की कैंची बना कर मेरी कमर के गिर्द लगा ली। अब धक्के के साथ ही उसके नितम्ब भी ऊपर नीचे होने लगे। मैंने धक्के लगाने बंद कर दिए। आंटी ने एक तकिया अपने नितम्बों के नीचे लगा लिया और पैर नीचे कर दिए। ओह … अब तो जैसे मुझे आजादी ही मिल गई। मैंने अपने धक्कों की गति बढ़ा दी।

अपने जीवन में किसी चूत में अपना लंड डालने का यह मेरा पहला मौका था। यह ख़याल आते ही मेरे लंड की मोटाई शायद बढ़ गई थी और मैं अपने आप को बहुत जयादा उत्तेजित महसूस कर रहा था। लंड को उसके चूत की तह तक पेलते हुए मैं अपने पेडू से उनकी मदनमणि को भी रगड़ रहा था। मेरे तीखे नुकीले छोटे छोटे झांट उसे चुभ रहे थे और इस मीठी चुभन से उसे और भी रोमांच हो रहा था। उसकी तो सीत्कार पर सीत्कार निकल रही थी।

कोई 10 मिनट की धमाकेदार चुदाई के बाद मैं हांफने लगा। उसने मुझे कस कर पकड़ लिया। उनका शरीर कुछ अकड़ा और फिर उसने एक जोर की किलकारी मारी। शायद वो झड़ गई थी। मैं रुक गया। उनकी साँसें जोर जोर से चल रही थी। कुछ देर ऐसे ही पड़ी रहने के बाद वो बोली,”चंदू क्या मैं ऊपर आ जाऊं ?”

मुझे क्या ऐतराज़ हो सकता था। अब हमने एक पलटी मारी और आंटी ठीक मेरे ऊपर थी। अब सारी कमान जैसे उसी के हाथों में थी। उसका अपनी चूत को अन्दर से सिकोड़ना और मेरे लंड को अन्दर चूसना तो मुझे मस्त ही किये जा रहा था। यह तो उसने पहले ही मेरा पानी एक बार निकाल दिया था नहीं तो इतनी गर्मी और उत्तेजना के मारे मैं कब का झड़ जाता।

उसने अपने नितम्ब घुमाते हुए धक्के लगाने चालू कर दिए। वो थोड़ी झुक कर अपनी कोहनियों के बल बैठी धक्के लगने लगी। मैंने हाथ बढ़ा कर उसके उरोजों को पकड़ लिया और चूसने लगा। एक हाथ से उसके नितम्ब सहला रहा था और कभी कभी उसकी पीठ या कमर भी सहला रहा था। मैं तो मदहोश ही हुआ जा रहा था। जैसे ही उसके नितम्ब नीचे आते तो गच्च की आवाज आती जिसे सुनकर हम दोनों ही मस्त हो जाते। उसने बताया,”जब तुम्हें लगे की अब निकलने वाला है तो इस घड़ी की टिकटिक पर ध्यान लगा लेना, फिर तुम 5-6 मिनट तक नहीं झड़ोगे। जब झड़ने लगो तो मुझे बता देना !”

हम दोनों अब पूरी तरह से मदहोश होकर मजे की दुनिया में उतर चुके थे। अब मैं भी कितनी देर रुकता। मैंने जोर जोर से धक्के लगाने चालू कर दिए। अभी मैंने 4-5 धक्के ही लगाये थे कि मुझे लगा उसकी चूत ने संकोचन करना चालू कर दिया है। ऐसा महसूस होते ही मेरी पिचकारी और आंटी की सीत्कार दोनों एक साथ निकल गई। उसकी चूत मेरे गाढ़े गर्म वीर्य से लबालब भर गई। आंटी ने मुझे अपनी बाहों में इतनी जोर से जकड़ा कि उसके हाथों की 4-5 चूड़ियाँ ही चटक गई। पता नहीं कब तक हम इसी तरह एक दूसरे की बाहों में लिपटे पड़े रहे। आंटी ने बताया था कि स्खलन के बाद लिंग को तुरंत योनि से बाहर नहीं निकलना चाहिए कुछ देर ऐसे ही अन्दर पड़े रहने देना चाहिए इससे पौरुष शक्ति फिर से मिल जाती है।

रात भी बहुत हो चुकी थी और इतनी जबरदस्त चुदाई के बाद हम दोनों में से किसी को होश नहीं था, मैं आंटी के ऊपर से लुढ़क कर उसके बगल में लेट गया। वह भी अपनी आँखें बंद किये अपनी सांसो को सँभालने में लग गई। एक दूसरे की बाहों में लिपटे हमें कब नींद ने अपने आगोश में भर लिया पता ही नहीं चला।

सुबह कोई 8 बजे हम दोनों की नींद खुली। मैं एक बार उस परम सुख को फिर से भोग लेना चाहता था। जब आंटी बाथरूम से बाहर आई तो मैंने अपनी बाहें उसकी ओर फैलाई तो बोली,” नहीं चंदू ….. अब कुछ नहीं… गड़बड़ हो गई है ?”

“क … क.. क्या हुआ ?”

“लाल बाई आ गई है !”

“ये लाल बाई कौन है ?” मैंने हैरानी से पूछा।

“अरे बुद्धू महीने में एक बार हर जवान स्त्री रजस्वला होती है। और 3-4 दिन योनि में रक्त स्त्राव होता रहता है ताकि फिर से गर्भ धारण के लिए अंडा बना सके ?”

“ओह …” मेरा तो सारा उत्साह ही ठंडा पड़ गया।

“हालांकि इन दिनों में भी हम सम्भोग कर सकते हैं पर मुझे इन तीन दिनों में यह सब करना अच्छा नहीं लगता। कुछ विशेष परिस्थितियों में (जैसे नई शादी हुई हो या पति पत्नी कई दिनों बाद मिले हों) माहवारी के दौरान भी सम्भोग किया जा सकता है पर साफ़ सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए नहीं तो योनि में संक्रमण हो सकता है। कुछ दंपत्ति तो माहवारी के दौरान इसलिए सेक्स करना पसंद करते हैं कि वो समझते हैं कि इस दौरान सेक्स करने से गर्भ नहीं ठहरेगा। जबकि कई बार माहवारी के दिनों में सेक्स करने से भी गर्भ ठहर सकता है। मेरे साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है, तुम घबराओ मत अब तो बस एक सबक ही और बचा है वो 3 दिनों के बाद तुम्हें सिखाउंगी !” आंटी ने समझाया।

मैं अपने कपड़े पहनते हुए यह सोच रहा था कि चुदाई के बाद अब और कौन सा सबक बाकी रह गया है।

आपका प्रेम गुरु

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