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अठरह वर्ष पूर्व दिए गए वचन का मान रखा-2

Atharah Parsh Poorv Diye Vachan Ka maan Rakha-2

लेखिका : नलिनी रविन्द्रन
अनुवादक एवं प्रेषिका: तृष्णा लूथरा

आपने मेरी कहानी  पढ़ी :- अठरह वर्ष पूर्व दिए गए वचन का मान रखा-1

खाना समाप्त करने के बाद हम दोनों बैठक में बैठ कर उसके बचपन की भूली बिसरी बातें याद करके उन पर चर्चा करने लगे।
मुझे चर्चा के दौरान हैरानी और संकोच तब हुई जब नागेन्द्र ने उसके द्वारा मेरे दूध पीने के लिए जिद करने के बारे में याद कराया।

मैं तो समझती थी कि वह बड़ा हो गया है इसलिए बचपन की बातें समय के साथ भूल गया होगा लेकिन उसके मुँह से उस घटना का विस्तृत विवरण सुन कर मैंने झेंप कर चर्चा को बंद कर दिया तथा वहाँ से उठ गई।
इसके थोड़ी देर के बाद भाभी आ गई तब नागेन्द्र ने मुझसे और उनसे दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करा कर फैक्ट्री चला गया।

दो सप्ताह के बाद जब फैक्ट्री के लिए कुछ नई मशीनें खरीदने के लिए मेरे पति को यूरोप गए हुए तब एक दिन ही हुआ कि भाभी के मायके से सन्देश मिला कि उनकी माँ बहुत बीमार है।
यह सन्देश सुनते ही भईया भाभी उसी शाम को ही उनको देखने के लिए भाभी के मायके चले गए और जाते समय दूसरे दिन वापिस आने की बात कह गए।

उस दिन गर्मी बहुत ही अधिक थी, जब मैं रात का खाना बना कर रसोई से जैसे ही बाहर निकली तब पल्लवी ने मुझे देखते ही कहा- मम्मी, आप तो पसीने से भीग गई हो। ऐसा करो आप जल्दी से नहा लो, तब तक मैं नागेन्द्र भईया को बुला लाती हूँ। फिर हम सब एक साथ बैठ कर खाना खायेंगे।
पल्लवी के सुझाव को मानते हुए मैं नहाने के लिए सीधा बाथरूम घुस गई।

नहाना समाप्त करने के बाद जब मैं उठी तब मुझे बोध हुआ कि बाथरूम में घुसने की जल्दी में मैंने ना तो तौलिया लिया था और न ही पहनने के कपड़े उठाये थे।
मैंने बाथरूम के दरवाज़े को थोड़ा सा खोल कर देखा तो मुझे वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया और न ही किसी की आवाज़ सुनाई दी।
यह सोच कर कि पल्लवी और नागेन्द्र अभी नीचे से नहीं आये होंगे इसलिए बेधड़क हो कर नग्न ही अपने कमरे की अलमारी में से तौलिया निकाल कर शरीर पोंछने लगी।

शरीर पोंछने के बाद मैंने तौलिया बिस्तर पर रख दिया और अलमारी से अपने कपड़े निकलने लगी ही थी कि मुझे कमरे के दरवाज़े पर खड़ी पल्लवी की आवाज़ सुनाई दी- मम्मी, हम आ गए है। क्या आप नहा चुकी हैं?
पल्लवी की आवाज़ सुन कर मैंने सोचा वह अकेली ही होगी इसलिए मैं घूम कर उसे कुछ कहने लगी तभी मुझे उसके पीछे खड़ा नागेन्द्र दिखाई दिया।

मैं उन दोनों के सामने बिल्कुल नग्न अपने गुप्तांगों को अपने हाथों से छुपाने की चेष्टा करते हुए वहाँ से भाग कर बाथरूम में घुस गई।
बाथरूम में से मैंने पल्लवी को निर्देश दिया- पल्लवी, तुम चल कर खाना मेज़ पर लगाओ, तब तक मैं कपड़े पहन कर आती हूँ।

जब वे दोनों वहाँ से चले गए, तब मैंने बाथरूम से बाहर निकल कर जल्दी से अलमारी में से कपड़े निकाल कर पहने और बाहर जाने लगी, तब मुझे बहुत संकोच हो रहा था।
फिर भी शर्म से आँखें नीचे किये हुए मैं मेज़ के पास पहुँची तो देखा कि पल्लवी ने सारा खाना लगा दिया था और वे दोनों मेरी प्रतीक्षा में बैठे थे।
मैं पल्लवी के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गई और हम सब चुपचाप खाना खाते रहे।

खाना समाप्त करने के बाद नागेन्द्र और पल्लवी बैठक में टीवी देखने लगे और मैं रसोई समेट कर अपने कमरे में जाकर लेट गई।
मुझे लेटे हुए अभी आधा घंटा ही हुआ था कि नागेन्द्र ने मेरे कमरे का दरवाज़ा खटखटाया और पूछा- बुआ, क्या मैं अंदर आ सकता हूँ?
मैंने दरवाज़े की ओर करवट करते हुए उसे कहा- हाँ नागेन्द्र, आ जाओ।

जब वह अकेला कमरे में आया तो मैंने पूछा- पल्लवी कहाँ है?
वह बोला- वह अपने कमरे में सोने चली गई है।
मैंने पूछा- तुम सोने नहीं गए?
उसने उत्तर दिया- मैं बस सोने ही जा रहा था। जाने से पहले मैं आप से आज की अपनी गुस्ताखी के लिए माफ़ी मांगने आया हूँ।
मैंने उठ कर बैठते हुए पूछा- कैसी गुस्ताखी और किस बात की माफ़ी?
उसने हिचकिचाते हुए कहा- बुआ, मुझे उस समय पल्लवी के पीछे आपके कमरे में नहीं आना चाहिए था। प्लीज मुझे माफ़ कर दीजिये।
मैंने उसकी बात सुन कर कहा- कोई बात नहीं, जो हुआ सो हुआ। अब आगे से ध्यान रखना और इस बात का उल्लेख किसी से नहीं करना।

वह ‘अच्छा’ कह कर जाने को मुड़ा लेकिन फिर रुक गया और वापिस मेरी ओर मुड़ करके बोला- बुआ, अगर आप बुरा नहीं मानेगी तो क्या मैं आपसे एक बात कह सकता हूँ।
मैंने उत्सुकतावश उससे पूछ लिया- ऐसी क्या बात है जो तुम मुझसे इतनी रात में कहना चाहते हो?

वह थोड़ा शर्माते हुए बोला- बुआ, आपकी कसम मैं सच कह रहा हूँ कि आप अभी भी बहुत जवान और खूबसूरत लगती हो और बिना कपड़ों के तो आप एक परी की तरह अत्यधिक सुंदर लगती हो।

उसकी बात सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा लेकिन झूट-मूठ का रोष दिखाते हुए मैंने कहा- तुझे अपनी बुआ से ऐसी बात करते हुए शर्म नहीं आती। भाभी को आने दे, फिर मैं तुझे बताऊँगी कि मैं कैसी हूँ।

मेरी बात सुनते ही वह मेरे पास आ कर बोला- बुआ, मुझे माफ़ कर दो, प्लीज मम्मी से कुछ मत कहना। कहते हैं कि हर स्त्री को अपनी सुन्दरता की प्रशंसा सुनना अच्छा लगता है इसलिए यह सोचते हुए कि आपको भी अच्छा लगेगा, मैंने जो सच है वह कह दिया।

मैं उसकी बात सुन कर मन ही मन मुस्कराई और उसके हाथ को पकड़ कर उसे खींच कर अपने पास बिठाते हुए पूछा- अच्छा, मान लिया कि तुम सच कह रहे हो लेकिन तुमने यह तो बताया नहीं कि तुम्हें मुझमें क्या सुंदर लगा?
मेरा प्रश्न सुन कर वह बोला- अगर मैं किसी भी एक अंग का नाम लूँगा तो वह आपके बाकी सभी अंगों के साथ अन्याय होगा। आपके तो सभी अंग बहुत सुन्दर हैं।
मैंने उसे कहा- अगर तुमने टाल-मटोल जारी रखी और मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया तो मैं तुम्हे माफ़ नहीं करुँगी और भाभी को तुम्हारी सभी हरकतों के बारे में अवश्य बताऊँगी।

मेरी बात सुन कर उसने कहा- बुआ मुझे तुम्हारे दो अंग अत्यंत ही सुन्दर लगते है लेकिन मुझे उन अंगों का नाम बताते हुए शर्म आ रही है। अगर आप आँखें बंद कर लें तो शायद बता सकूँ।

क्योंकि मुझे उसकी बातों में वैसा ही आनन्द आ रहा था जैसा चौदह-पन्द्रह वर्ष पहले उससे बातें करते हुए आता था इसलिए मैंने अपनी आँखें बंद करते हुए उससे कहा- लो मैंने अपनी आँखें बंद कर ली हैं, अब तुम बताओ उनका नाम?
मेरी बात सुन कर उसने कहा- अच्छा बताता हूँ लेकिन आप नाराज़ नहीं होना।

उसके बाद जब मुझे अपने स्तनों और जघन-स्थल पर उसके हाथ का स्पर्श महसूस हुआ तब मैंने आँखें खोलते हुए गुस्से से कहा- यह क्या कर रहे हो?
वह डर कर खड़ा हो गया और अपने कान पकड़ कर कहा- बुआ, मुझे इन अंगों के सिर्फ अभद्र नाम ही पता है जो मैं आपके सामने बोलना नहीं चाहता था, इसलिए उन अंगों को छू कर बता दिया है।

मैंने उसकी बात सुन कर अपना रोष दिखाते हुए कहा- क्या तुम्हें पता नहीं कि किसी भी स्त्री के इन अंगों को उसकी अनुमति के बिना कभी भी नहीं छूते हैं।
मेरी बात के उत्तर में उसने कहा- बुआ, इस बात का मुझे मालूम है, लेकिन आपने तो मुझे इन अंगों को छूने की अनुमति बचपन से ही दे रखी है इसलिए मेरे द्वारा इन्हें छूने से आपको कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

उसके द्वारा दिए गए तर्क को सुनने के बाद मैंने उसे पूछा- तुम्हें ये दोनों अंग अत्यंत सुंदर क्यों लगते हैं?
उसने कहा- आपके ऊपर वाले अंग तो अभी भी वैसे ही हैं जैसे पहले थे जब मैं इनमें से दूध पीता था। इनकी गोल बनावट और इनके ऊपर काले रंग के गोल अंगूर इसकी शोभा को और भी बढ़ा देते हैं। तथा आपके नीचे के अंग पर उगे हुए छोटे छोटे गहरे भूरे बाल बहुत ही मनमोहक लगते हैं।

मैंने उसकी बात सुनी और घड़ी की ओर देखा तो रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे इसलिए उस बात को आगे नहीं बढ़ाते हुए उसे अपने कमरे में जा कर सोने के लिए कहा।
अपने कमरे में जाने की बात सुन कर नागेन्द्र का चेहरा उदासी से लटक गया और उसने बड़ी मायूसी से मेरे पास आ कर पूछा- बुआ, क्या मैं आज की रात आप के साथ वाले बिस्तर पर सो सकता हूँ?

उसकी बात सुन कर मैंने पूछा- तुम्हें अपने कमरे में सोने में क्या परेशानी है?
तब उसने उत्तर दिया- एक तो नीचे घर में और कोई नहीं है इसलिए मुझे सुबह कौन उठाएगा। दूसरा आपके साथ सोये हुए मुझे कई वर्षों बीत गए इसलिए मैं चाहता हूँ कि आपके साथ तो नहीं लेकिन आप के साथ वाले बिस्तर में तो सो जाऊँ?
उसके उत्तर एवं उसकी रोनी सूरत को देख कर मेरा मन पसीज गया और मैंने उसे मेरे बिस्तर के साथ वाले बिस्तर पर सोने के लिए कह दिया।

मेरी बात सुन कर वह बहुत खुश हो गया और वहीं खड़े खड़े ही उसने अपने कपड़े उतार दिए और सिर्फ अंडरवियर में ही बिस्तर पर लेट गया।
यह देख कर मैंने उससे पूछा- क्या तुम अपने कमरे में भी ऐसे ही सोते हो?’
उसने कहा- नहीं, यहाँ तो मैंने अंडरवियर पहना हुआ है। अपने कमरे में तो मैं यह भी नहीं पहन कर सोता हूँ।
मैंने पूछा- क्या भाभी को मालूम है कि रात को अपने कमरे में तुम बिल्कुल नग्न सोते हो?
उसने उत्तर दिया- हाँ मम्मी और पापा दोनों को मालूम है, इसलिए वे रात में मेरे कमरे में कभी भी नहीं आते और ना ही किसी को आने देते हैं। सुबह मुझे उठाने के लिए भी बाहर से ही पुकार कर उठा देते हैं।

इसके बाद हम दोनों ने करवट ली और एक दूसरे की ओर पीठ कर के लेट गए।

जब नागेन्द्र सिर्फ अंडरवियर में मेरी ओर मुँह करके साथ वाले बिस्तर पर लेटा हुआ था तब मैंने उसके अंडरवियर में उभार को देखा था तो मेरे शरीर में अजीब सी झुरझुरी हुई थी और मुझे अपने पति की याद आने लगी थी।
मैं सोच में पड़ गई और मेरे मन में प्रश्न उठने लगे कि उसकी बचपन में दिखने वाली छोटी सी टल्ली क्या अब एक सम्पूर्ण लिंग बन चुका होगा और उसके लिंग का आकार कितना होगा तथा बनावट एवं रंग कैसा होगा?

इन प्रश्नों की उलझन में मेरी आँखों में नींद ही उड़ गई थी और मैं बार बार उठ कर उस उभार को देखने की चेष्टा करती रही।
जब कोई सफलता नहीं मिली तो झल्ला कर अपने बिस्तर पर लेट गई और कब नींद के आगोश में चली गई पता ही नहीं चला।

सुबह चार बजे के करीब मैं नींद की खुमारी में थी जब मुझे महसूस हुआ की कोई मेरे बिस्तर में मेरे साथ सट कर सो रहा है और उसके लिंग का दबाव मेरे नितम्बों की दरार में लग रहा था।
अर्धनिद्रा अवस्था में होने के कारण मैंने समझा कि मेरे पति होंगे इसलिए करवट बदल कर अपना मुँह उस ओर कर लिया और अपने हाथ से लिंग को अंडरवियर से बाहर निकाल कर सहलाने लगी।
देखते ही देखते वह लिंग तन कर एकदम बहुत सख्त हो कर गया और वह इतना मोटा हो गया था की मेरे हाथों में ढंग से समां भी नहीं रहा था।
तब मैं अर्ध-नींद अवस्था से बाहर आई और मुझे चेतना हुई कि वह लिंग मेरे पति का नहीं किसी और का था।

मैंने तुरंत ही उठ कर छोटी लाईट जलाई तो देखा कि नागेन्द्र सीधा लेटा हुआ था और उसका सात इंच लम्बा एवं ढाई इंच व्यास का लिंग उसके अंडरवियर से बाहर निकला हुआ था तथा एक मीनार की तरह बिलकुल सीधा खड़ा छत की ओर संकेत कर रहा था।
कमरे में उजाला हो जाने के कारण नागेन्द्र ने अपनी आँखें खोल दी और मुझे उसके लिंग को गौर से निहारते हुए देख कर कहा- बुआ क्या देख रही हो?
उसकी आवाज़ सुन कर मैं चौंक गई कि जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई हो इसलिए हड़बड़ा कर मैं ‘कुछ नहीं, कुछ नहीं’ कहते हुए लेट गई।
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मेरे लेटते ही नागेन्द्र करवट ले कर मेरे साथ सट गया और उसका सख्त लिंग मेरी जाँघों को अपने अस्तित्व का बोध कराने लगा।
इससे पहले कि मैं उससे कुछ कहती या उससे अपने को अलग करती उसने पूछ लिया- बुआ, मुझे लगता है कि शायद आप यह देखना चाहती होंगी कि अब मेरी टल्ली कितनी बड़ी हो गई है। इसीलिए आपने इसे अंडरवियर से बाहर निकाल कर लम्बा एवं सख्त कर दिया है।
मैंने उससे से थोड़ा अलग होते हुए गुस्से से कहा- यह कैसी बेहूदा बातें कर रहे हो? और तुम मेरे बिस्तर पर क्यों आ गए हो? चलो हटो और अपने बिस्तर पर जाओ।

मेरे इतना कहते ही वह मुझसे अलग होने के बजाये मुझे अपने बाहुपाश में ले लिए और कहा- बुआ, तुमने मुझे एक वचन दिया था वह कब पूरा करोगी?
मैंने पूछा- कैसा वचन, कौन सा वचन?
मेरी बात सुनते ही नागेन्द्र ने उठ कर अपने अंडरवियर को उतारा कर दूर फेंका और मेरे सामने खड़ा हो कर बोला- बुआ, क्या आप भूल गई की आपने मुझे वचन दिया था कि जब मेरी टल्ली बड़ी हो जायेगी तब आप इसे अपनी गुम हुई टल्ली की जगह लगा लेंगी?

इसके बाद फिर मेरे साथ लेटते हुए उसने अपने लिंग को मेरे हाथ में दे कर कहा- आप इसे अपने हाथ में लेकर इसकी जांच कर लीजिये, देखिये अब यह बहुत बड़ी हो गई है इसलिए अब आप इसे बड़े आराम से अपने शरीर में लगा सकती हैं।

उसकी बात सुन कर तथा उसके लिंग की मोटाई एवं कड़कपन को अपने हाथों से महसूस करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि नागेन्द्र का लिंग की लम्बाई तो मेरे पति के लिंग के बराबर ही थी लेकिन उसका लिंग मेरे पति के लिंग से काफी मोटा तथा अधिक कड़क था।
क्योंकि मुझे दो दिनों से पति का लिंग नसीब नहीं हुआ था इसलिए मेरे हाथ में जब नागेन्द्र का लिंग आया तब मेरी योनि में झुरझुरी होने लगी और मेरे मन में उस लिंग को लेने की लालसा जाग उठी।

मैं इस दुविधा में थी की आगे क्या कहूँ या करूँ तभी नागेन्द्र ने मुझसे पूछा- बुआ, आप कुछ बोल नहीं रही। आपने यह भी नहीं बताया की आप अपना वचन कब निभाएँगी?
उसकी बात ने मेरी दुविधा का समाधान कर दिया और मैंने तुरंत कहा- नागेन्द्र, एक ना एक दिन तो तुम्हें दिया हुआ वचन निभाना ही है इसलिए सोच रही हूँ कि क्यों नहीं आज और अभी निभा दूँ।

मेरी बात सुनते ही नागेन्द्र ख़ुशी के मारे उछल पड़ा और एक करवट लेते हुए मेरे ऊपर आ कर लेट गया तथा मेरी दोनों जाँघों बीच में घुसने के लिए उसका लिंग दबाव बनाने लगा।
मेरी भी उत्तेजना बढ़ गई थी इसलिए मैंने उसे अपने ऊपर तक खींचा और अपने होंटों को उसके होंटों से लगा दिया।

फिर क्या था नागेन्द्र ने तुरंत मेरे होंटों और जीभ को चुसना शुरू कर दिया और साथ साथ अपने हाथों से मेरे दोनों स्तनों को मसलने लगा।
मैंने भी चुम्बन में उसका साथ दिया और उसके होंठों एवं जीभ को को काफी देर तक चूसती रही।
लगभग दस मिनट के बाद जब मेरी उत्तेजना में वृद्धि नहीं हुई तब मैंने अपनी नाइटी को ऊपर कर के नागेन्द्र के मुँह में अपना चुचूक देकर चूसने का संकेत दिया।

कुछ ही देर में ही मैंने महसूस किया की नागेन्द्र द्वारा मेरे स्तनों को मसलने एवं मेरे चुचूकों को चूसने से इस बार मेरे शरीर में मातृत्व प्रेम की जगह वासना की लहरें दौड़ने लगी थी।

अगले दस मिनट तक मेरे स्तनों में उठ रही तरंगें लगातार दौड़ कर मेरी योनि के अंदर जाती रही और मेरे शरीर में उठ रही वासना की लहरों को बहुत उत्तेजित कर दिया।
मैं उस उत्तेजित स्तिथि में नागेन्द्र को बार बार चूम रही थी एवं उसके लिंग को पकड हर ज़ोर ज़ोर से हिलाने लगी थी।

तभी नागेन्द्र ने मेरे चुचूकों को चूसना छोड़ दिया और मेरी नाभि को चूमने एवं उसमे अपनी जीभ को घुमाने लगा जिससे मेरी उत्तेजना में और भी वृद्धि हो गई और मेरे मुख से सिसकारियाँ निकलने लगी।
मैं अपने पर नियंत्रण नहीं रख सकी तथा मैंने उसके सिर को पकड़ कर नीच को धकेला और उसके मुख को अपनी योनि के ऊपर दबा दिया।
शायद मेरी योनि की सुगंध से नागेन्द्र भी उत्तजित हो उठा था इसलिए वह तुरंत उस पर टूट पड़ा और अपनी जीभ से योनि के होटों और भगनासा को चाटने लगा।

मेरे भगनासा पर नागेन्द्र की जीभ के लगते ही मैं सिहर उठी और एक झटके के साथ मैंने उसके सिर को अपनी जाँघों के बीच में दबा लिया।
अपने सिर को मेरी जाँघों के बीच में जकड़े जाने पर उसने दोनों हाथों से मेरे घुटनों को पकड़ कर अलग किया और मेरी टांगों को चौड़ा कर के मेरी योनि में अपनी जीभ को घुसा कर घुमाने लगा।

उसकी जीभ जब जब मेरी योनि के अन्दर स्तिथ जी-स्पॉट से टकराती, मेरी सिसकारी एक हल्की चीख में बदल जाती और मेरे पूरे शरीर में से कम्पन की एक लहर गुज़र जाती।

लगभग पांच मिनट तक जब नागेन्द्र की जीभ ने लगातार मेरे जी-स्पॉट का घर्षण किया तब एक चीख के साथ मेरी योनि में से पूर्व-रस की कुछ बूंदें निकल पड़ी।

नागेन्द्र को जैसे ही उस पूर्व-रस की बूंदों के स्वाद का आभास हुआ तब वो और भी अधिक तेजी से अपनी जीभ को मेरे जी-स्पॉट पर चलाने लगा।
उसका ऐसे करने से उसे मेरी सिसकारियों एवं हल्की चीखों के साथ लगातार टपकने वाली पूर्व-रस की बूंदों का रसपान वह बहुत ही शौक से करने लगा।
मेरी बढ़ रही उत्तेजना के कारण मैं अपने पर नियंत्रण नहीं रख सकी और नागेन्द्र को हटा कर पलट गई तथा उसके लिंग को अपने मुँह में ले कर चूसने लगी एवं अपनी योनि को फिर से उसके हवाले कर दी।
अगले पन्द्रह मिनट तक हम दोनों इस 69 की अवस्था में एक दूसरे को चूसते एवं चाटते रहे और दोनों के गुप्तांगों से टपकने वाले पूर्व-रस का रसपान करते रहे।

इससे पहले कि हम दोनों की उत्तेजना चरमसीमा के शिखर पर पहुँचे मैंने नागेन्द्र के मुँह को अपनी योनि एवं अपने मुँह को उसके लिंग से अलग कर दिया।
फिर मैं पीठ के बल सीधा होकर लेट गई और अपनी टांगें चौड़ी करके नागेन्द्र को अपने ऊपर खींचा और हाथ बढ़ा कर उसके लिंग को पकड़ कर अपनी योनि के मुँह पर टिका दिया।

मेरा ऐसे करते ही उसने एक धक्का लगा कर अपने फूले हुए तीन इंच व्यास की लिंगमुंड को मेरी यो्नि के अन्दर धकेल दिया और उसके बाद पूरा दबाव बना कर उसने पूरे लिंग को जड़ तक मेरी योनि के अंदर पहुंचा दिया।
मेरी योनि इतने मोटे लिंग एवं लिंग-मुंड से अभ्यस्त नहीं होने के कारण मुझे बहुत तीव्र दर्द हुई और एक बार तो मुझे संदेह होने लगा की शायद मेरी योनि की त्वचा फट गई थी।
अगले पांच मिनट तक मैंने नागेन्द्र को हिलने से रोक दिया और अपनी दर्द को सहन कर कम होने की प्रतीक्षा करने लगी तथा योनि को उसके लिंग को अपने में समायोजित होने दिया।

पांच मिनट का समय गुजरने के बाद मेरे कहने पर जब उसने हिलना शुरू किया और लिंग को योनि के अन्दर बाहर करने लगा तब मुझे महसूस हुआ कि लिंग मेरी योनि के अंदर बहुत ही फंस कर अंदर बाहर हो रहा था।

अगले बीस मिनट तक नागेन्द्र अपने लिंग को पहले धीरे धीरे, फिर थोड़ा तेज़ी से, उसके बाद अधिक तेज़ी से मेरी योनि के अंदर बाहर करता रहा।
जब मेरी योनि के अंदर लिंग की बहुत अधिक रगड़ लगने लगी और उसमे अत्यंत हलचल एवं सिकुडन होने लगी तब मेरे मुँह से लगातार सिसकारियाँ निकलने लगी।
अपने लिंग पर मेरी योनि की सिकुड़न महसूस करके और मेरी सिसकारियाँ सुन कर नागेन्द्र की उत्तेजना अत्यधिक बढ़ गई और उसने बहुत ही तीव्र गति से धक्के लगाने शुरू कर दिये।
हमारी साँसें फूलने लगी थी और दोनों का बदन पसीने से लथपथ हो गया था।

तभी नागेन्द्र ने एक हुंकार भरी और बहुत जोर से एक धक्का लगा दिया और उसका पूरा लिंग मेरी योनि में घुस कर मेरे गर्भाशय की दीवार से टकराया जिससे मेरी योनि में बहुत ही तीव्र सिकुड़न हुई।
योनि में हो रही सिकुड़न ने नागेन्द्र के लिंग को कस कर जकड़ लिया जिससे उसका लिंग बहुत फंस कर अंदर बाहर होने लगा और इससे हम दोनों को बहुत ही तीव्र रगड़ लगने लगी थी।

दोनों के गुप्तांगों में हो रही भीषण रगड़ के कारण हमारी उत्तेजना चरमसीमा के शिखर पर पहुँची और हम दोनों ने एक साथ ही अपने अपने रस का स्खलन कर दिया।
मेरी योनि के अंदर उस स्खलित रस का एक तालाब बन गया जिसमे नागेन्द्र का लिंग-मुंड डुबकियाँ लगा रहा था।
पसीने से भीगे हुए, उखड़ी साँसों से हाँफते हुए और थकावट के मारे नागेन्द्र मेरे ऊपर निढाल होकर लेट गया और मैंने उसके अपनी बाहों के घेरे में ले कर अपने से चिपटा लिया।

लगभग अगले आधा घण्टे तक हम दोनों एक दूसरे से चिपट कर लेटे रहे और फिर जब खिड़की में से रोशनी दिखी तब मुझे काफी समय बीत जाने का बोध हुआ और मैंने हड़बड़ा कर समय देखा तो सुबह के साढ़े पांच बजे थे।
मैंने उठ कर नागेन्द्र को तुरंत अपने कमरे में जाने को कहा ताकि पल्लवी को यह नहीं पता चले कि वह मेरे साथ सोया था और मैंने बाथरूम में जा कर अपने को साफ़ किया तथा कपड़े पहन कर काम में लग गई।

नागेन्द्र तो आगे भी मेरे साथ संसर्ग के लिए इच्छुक था लेकिन मैंने उसे फिर कभी कोई मौका नहीं दिया।
इस प्रकार लगभग अठरह वर्ष पूर्व दिए गए वचन का मान रखा।
trishnaluthra@gmail.com

 

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